Saturday, April 13, 2019

एक औरत .....पूजा प्रियम्वदा

तुम्हारे बच्चों की माँ को
उनके साथ सोता छोड़कर
एक औरत दुनिया में लौटती है
हँसती है
जितना वो चाहें
जब वो चाहें और
पहनती है जो वो चाहें
उतारती है जब वो चाहें
जिस्म से बहुत गहरे कहीं
खुद को अजनबियों के नीचे
एक सामूहिक कब्र में दफन कर
लौट आती है
धोती है गर्म पानी से हाथ
तुम्हारी बेटी के चेहरे को सहलाती है
तुम्हारे बेटे का माथा चूमती है
फिर से सिर्फ उनकी माँ बन जाती है


7 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (14-04-2019) को "दया करो हे दुर्गा माता" (चर्चा अंक-3305) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    दुर्गाअष्टमी और श्री राम नवमी की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    --
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. शीर्षक ' दो औरत ' होनी चाहिए। समाज में ' आधुनिक चकाचौंध ' और ' पारंपरिक बेबसी ' की दो परतों में क्रमशः खिलखिलाती और बिलबिलाती ज़िंदगियों की हकीकत बयानी!

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  3. बहुत ही मार्मिक..

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  4. वाह बहुत खूब बेहतरीन।

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  5. बहुत मार्मिक रचना

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