Tuesday, August 22, 2017

अमाँ हम भी किरायेदार ही हैं....नवीन सी. चतुर्वेदी

चढा कर तीर नज़रों की कमाँ पर। 
हसीनों के क़दम हैं आसमाँ पर॥ 

हरिक लमहा लगे वो आ रहे हैं। 
यक़ीं बढता ही जाता है गुमां पर॥ 

कोई वादा वफ़ा हो जाये शायद। 
भरोसा आज भी है जानेजाँ पर॥ 

उतरती ही नहीं बोसों की लज़्ज़त। 
अभी तक स्वाद रक्खा है ज़ुबाँ पर॥ 

किसी की रूह प्यासी रह न जाये। 
लिहाज़ा ग़म बरसते हैं जहाँ पर॥ 

अगर भटका तो इस को छोड़ देंगे। 
नज़र रक्खे हुये हैं कारवाँ पर॥ 

अमाँ हम भी किरायेदार ही हैं। 
भले ही नाम लिक्खा है मकाँ पर॥ 

-नवीन सी. चतुर्वेदी
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1 comment:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (23-08-2017) को "खारिज तीन तलाक" (चर्चा अंक 2705) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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