Monday, August 21, 2017

भरम का भरम लाज की लाज रख लो...सूर्यकान्त त्रिपाठी "निराला"

अजब नक - चढ़ा आदमी हूँ
जो तुक की कहो बे-तुका आदमी हूँ

बड़े आदमी तो बड़े चैन से हैं
मुसीबत मिरी मैं खरा आदमी हूँ

सभी माशा-अल्लाह सुब्हान-अल्लाह
हो ला-हौल मुझ पर मैं क्या आदमी हूँ

ये बचना बिदकना छटकना मुझी से
मिरी जान मैं तो तिरा आदमी हूँ

अगर सच है सच्चाई होती है उर्यां
मैं उर्यां बरहना खुला आदमी हूँ

टटोलो परख लो चलो आज़मा लो
ख़ुदा की क़सम बा-ख़ुदा आदमी हूँ

भरम का भरम लाज की लाज रख लो
था सब को यही वसवसा आदमी हूँ"।

-सूर्यकान्त त्रिपाठी "निराला"

4 comments:

  1. सूर्य‎कान्त त्रिपाठी "निराला" की दुर्लभ रचना‎ .बहुत सुन्दर‎ .

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  2. महाकवि निराला जी की अर्थपूर्ण ,मननशील, साहित्य के खजाने में संरक्षित अनूठी गज़ल पेश करने के लिए आभार।

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (22-08-2017) को "सभ्यता पर ज़ुल्म ढाती है सुरा" (चर्चा अंक 2704) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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