Thursday, April 27, 2017

वही रिश्ता प्यासा तिश्नगी से.....नूर मुहम्मद 'नूर'

हवा से, रोशनी से, ज़िन्दगी से
मैं आजिज आ न जाऊं शायरी से

भरोसा तोड़ता फिरता हूं सबका
मैं क्या बोलूं अपने आदमी से

मैं सहरा से ज्यादा कुछ कहां था
वही रिश्ता प्यासा तिश्नगी से

यही काम आएगी ऐ नूर भाई
भरोसा हो चला है तिरगी से

ये दुनियां और उसकी दुनियादारी
फकत देखा करूं बस बेबसी से

- नूर मुहम्मद 'नूर' 

5 comments:

  1. वाह..खूबसूरत।

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  2. वाह..खूबसूरत।

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  3. बहुत ही प्रभावी।।।।

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  4. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (30-04-2017) को
    "आस अभी ज़िंदा है" (चर्चा अंक-2625)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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