Wednesday, April 26, 2017

क्या हादसा ये अजब हो गया.....महेश चन्द्र गुप्त ‘ख़लिश’


क्या हादसा ये अजब हो गया 
बूढ़े हुए, इश्क़ रब हो गया

चाहत का पैग़ाम तब है मिला 
पूरा सभी शौक जब हो गया 

हम आ गए ज़ुल्फ़ की क़ैद में
मिलना ही उनसे गजब हो गया 

रहते थे हमसे बहुत दूर वो 
मिलने का ये शौक कब हो गया 

हमको मिला ना ख़ुदा, ना सनम 
पूरा ख़लिश वक़्त अब हो गया.

-महेश चन्द्र गुप्त ‘ख़लिश’

3 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरूवार (27-04-2017) को पाँच लिंकों का आनन्द "अतिथि चर्चा-अंक-650" पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना चर्चाकार का नैतिक कर्तव्य होता है।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सुन्दर रचना ! आदरणीय, आभार।

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