Saturday, April 1, 2017

जीने के बहाने कब तक ढूंढते फिरे....मनीष कुमार ‘मुसाफिर’


हरेक दर्द से अब तो गुजर जाना है
करके खुद से वादा मुकर जाना है ।

जानते है कि जख्म जीने नही देंगे
दर्दे जिगर में थोड़ा उतर जाना है ।

जीने के बहाने कब तक ढूंढते फिरे
मौत आयेगी और हमें मर जाना है ।

क्या जानेगा बेदर्द जमाना कोई दर्द
अपने दर्द से थोड़ा संवर जाना है ।

अपनी मौत हम खुद मरना चाहेंगे
जीकर दो पल फिर ठहर जाना है ।

जिंदगी और मौत तो बस एक खेल
बनके खिलौना हमें बिखर जाना है ।

3 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (02-04-2017) को
    "बना दिया हमें "फूल" (चर्चा अंक-2613
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  2. बहुत सुन्दर

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