Monday, April 3, 2017

जिन्दगी का गणित..........मंजू मिश्रा




बरस महीने दिन 
छोटे छोटे होते 
अदृश्य ही हो जाते हैं 
और मैं 
बैठी रहती हूँ 
अभी भी 
उनको उँगलियों पे 
गिनते हुए 
बार बार 
हिसाब लगाती हूँ 
मगर
जिन्दगी का गणित है कि
सही बैठता ही नहीं
-मंजू मिश्रा

5 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (04-04-2017) को

    "जिन्दगी का गणित" (चर्चा अंक-2614)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    विक्रमी सम्वत् 2074 की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन सैम मानेकशॉ और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है।कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  3. यही तो जिंदगी है ... गणित ठीक कहाँ बैठता है सबका ... मुश्किल है सब्जेक्ट भी और समझ भी ...

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  4. जिन्दगी गणित नहीं है यह तो कविता है..कविता की तरह गुनगुनाएं जिन्दगी को तो यह सारे राज खोल देती है..

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