Saturday, October 8, 2016

औरत का दर्द............दिनेश ध्यानी









औरत का दर्द
आजीवन पराश्रित
कहने को तो घर की लक्ष्मी
हक़ीक़त में
लाचार और विवश।

जन्मने से पहले
जन्मने के बाद न जाने 
कब दबा दिया जाय
इसका गला।

तरेरती आँखें नोचने को तत्पर
न घर, न बाहर रही अब सुरक्षित,
जीवन की रटना
जीवन भर खटना
दूसरों की खातिर
खुद को होम करना।

-दिनेश ध्यानी

dineshdhyani@yahoo.com

3 comments:

  1. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल रविवार (09-10-2016) के चर्चा मंच "मातृ-शक्ति की छाँव" (चर्चा अंक-2490) पर भी होगी!
    शारदेय नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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