Friday, October 14, 2016

ज़िन्दगी...............सरोज भटनागर

क्षणिकाएँ


 1
दिल कुछ सोच कर
गुदगुदा जाता है
कि राह में दो कदम चल कर
कोई मुस्कुरा जाता है
ना जाने कभी कोई क्षण
ज़िन्दगी को ज़िन्दगी बना जाता है।

2
ज़िन्दगी जब भी कभी
ख़ुद को पढ़ा करती है
एक हल्की सी पीड़ा
मुँह पर चादर ओढ़ लेती है,
दुख इतने मिले कि
पलकों से चुन लेती हूँ
अरे - सुख एक मिला
वो भी बोझ बन गया।

3
हँस रहा था अभी वह
और घर जाते जाते मर गया
ज़िन्दगी और मौत का 
फ़ासला तो देखिए ज़रा।

4
ज़िन्दगी ने जो ग़म सहा
वह औरों का दिया नहीं था
वो ज़ख़्‍म ख़न्जरों के भी नहीं थे,
मीठे बोल रेशम में लपेटे
बहुत बार सुने हैं अपनों से।

-सरोज भटनागर

2 comments:

  1. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल शनिवार (15-10-2016) के चर्चा मंच "उम्मीदों का संसार" {चर्चा अंक- 2496} पर भी होगी!
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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