दिखाऊँगा किसी दिन मैं भी जा करके मदीने में।
हज़ारों दर्द मैंने दफ़्न कर रक्खे हैं सीने में।
चलो देखें ज़रा चलकर सफ़ीने को हुआ क्या है,
किसी ने छेद कर रक्खा है क्या मेरे सफीने में।
मुझे बेकार लगता है हमेशा मैकदा जाना,
मज़ा तो यार आता है तेरी आँखों से पीने में।
गरीबों के लिए दो वक़्त की रोटी ही काफी है,
सुकूने-क़ल्ब दिखता है गरीबों के पसीने में।
तुम्हें देखेगा बेपर्दा कभी कोई तो कह देगा ,
बला का हुस्न है यारो क़सम से इस नगीने में।
अजब हालात पैदा हो गए हैं दौरे-हाज़िर में,
"कुँवर" अच्छा नहीं लगता है अब तो यार जीने में।
-कुँवर कुसुमेश
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सुकूने-क़ल्ब = दिल का सुकून
दौरे-हाज़िर = वर्तमान परिस्थिति
मेरी ग़ज़ल आपको अच्छी लगी और आपने यहाँ share किया उसे,आभारी हूँ आपका, यशोदा बहन
ReplyDeleteआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (06-02-2016) को "घिर आए हैं ख्वाब" (चर्चा अंक-2244) पर भी होगी।
ReplyDelete--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
उम्दा
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