Friday, June 20, 2014

फिर मैंने सब कुछ हारा...............फाल्गुनी
















तुमने रखा मेरी गुलाबी हथेली पर
एक जलता हुआ शब्द-अंगारा
और कहा कि चीखना मत
बस यही सच है रिश्ता हमारा।

तुमने चाहा कि तुम्हारे शब्द की
जलती हुई चटकन को भूल
तुम्हें एक मुस्कान का शीतल छींटा दूँ
पर कैसे करती मैं वह,
जब हथेली में दर्द के हरे छाले
निकल आए।
और मेरे सुलगते सवालों के
तुम्हारे तीखे जवाब चलकर आए।

रिश्तों की दहलीज पर आज
फिर मैंने सब कुछ हारा,
बस, एक शब्द तुम्हारा
और खेल खत्म हुआ सारा। 


-फाल्गुनी

14 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (20.06.2014) को "भाग्य और पुरषार्थ में संतुलन " (चर्चा अंक-1649)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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  2. बहुत बढ़िया

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  3. बस, एक शब्द तुम्हारा
    और खेल खत्म हुआ सारा। ,,,सुन्दर !
    नौ रसों की जिंदगी !

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  4. बेहतरीन शब्दों में पिरोये भाव

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  5. रिश्तों की दहलीज पर आज
    फिर मैंने सब कुछ हारा,
    बस, एक शब्द तुम्हारा
    और खेल खत्म हुआ सारा।

    बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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  7. बहुत बढ़िया प्रस्तुति।

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  8. बढ़िया कविता

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  9. तुमने चाहा कि तुम्हारे शब्द की
    जलती हुई चटकन को भूल
    तुम्हें एक मुस्कान का शीतल छींटा दूँ
    पर कैसे करती मैं वह,
    जब हथेली में दर्द के हरे छाले
    निकल आए-----

    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति
    सादर -----

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  10. "शब्द बाण"
    शब्द बान से आँगन मेरा,
    पूरी तरह पिट रहा?
    बीच गगन टिमटिमाता दीप,
    जाने कब से दिख रहा॥
    आप की रचना बहुत सुन्दर है| जब हथेली में दर्द के हरे छाले
    निकल आए।
    और मेरे सुलगते सवालों के
    तुम्हारे तीखे जवाब चलकर आए।

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  11. कल 24/जून/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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