Thursday, May 15, 2014

थक गया हर शब्द.........तारादत्त निर्विरोध



 











थक गया हर शब्द
अपनी यात्रा में,
आँकड़ों को जोड़ता दिन
दफ़्तरों तक रह गया।

मन किसी अंधे कुएँ में
खोजने को जल
कागज़़ों में फिर गया दब,
कलम का सूरज
जला दिन भर
मगर है डूबने को अब।
एक क्षण कोई अबोली साँझ के
कान में यह बात आकर कह गया,
एक पूरा दिन, दफ़्तरों तक रह गया।

सुख नहीं लौटा
अभी तक काम से,
त्रासदी की देख गतिविधियाँ
बहुत चिढ़ है आदमी को
आदमी के नाम से।
एक उजली आस्था का भ्रम
फिर किसी दीवार जैसा ढह गया,
एक लंबी देह वाला दिन
दफ़्तरों तक रह गया।


-तारादत्त निर्विरोध

9 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (16.05.2014) को "मित्र वही जो बने सहायक
    " (चर्चा अंक-1614)"
    पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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  2. एक क्षण कोई अबोली साँझ के
    कान में यह बात आकर कह गया,
    एक पूरा दिन, दफ़्तरों तक रह गया।
    ...बहुत सही...
    दिन यूँ ही कब कैसे ढलता है पता ही नहीं चलता

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  3. एक उजली आस्था का भ्रम
    फिर किसी दीवार जैसा ढह गया,
    एक लंबी देह वाला दिन
    दफ़्तरों तक रह गया।

    सुंदर। पर अभी तो उजली आस्था जागी है।

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  4. कलम का सूरज जला दिन भर,बहुत चिढ है आदमी को,आदमी के नाम से
    एक लंबी देह वाला दिन,दफ्तरों तक रह गया----बहुत सटीक भावों का शब्दों में संयोजन.

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  5. खूबसूरत कथ्य...

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  6. सटीक रचना

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  7. बहुत सुन्दर रचना.. कथ्य बहुत स्तरीय ..

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  8. बेहद उम्दा रचना और बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपको बहुत बहुत बधाई...
    नयी पोस्ट@आप की जब थी जरुरत आपने धोखा दिया (नई ऑडियो रिकार्डिंग)

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