Sunday, June 2, 2013

फिर मंदिर को कोई मीरा दीवानी दे मौला..............निदा फ़ाज़ली


गरज बरस प्यासी धरती पर पानी दे मौला
चिड़ियों को दाने,बच्चों को गुडधानी दे मौला

दो और दो का जोड़ हंमेशा चार कहां होता है
सोच समझवालों को थोड़ी नादानी दे मौला

फिर रोशन कर ज़हर का प्याला चमका नई सलीबें

झूठों की दुनिया में सच को ताबानी दे मौला

फिर मूरत से बाहर आकर चारो ओर बिखर जा

फिर मंदिर को कोई मीरा दीवानी दे मौला

तेरे होते कोई किसी की जान का दुश्मन क्यों हैं

जीने वालों को मरने की आसानी दे मौला


......निदा फ़ाज़ली
श्री अशोक खाचर द्वारा प्रस्तुत
 

6 comments:

  1. सुंदर प्रस्तुति,,,गजल साझा करने के लिए आभार,,,

    RECENT POST : ऐसी गजल गाता नही,

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  2. बहुत बढिया ग़ज़ल......

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  3. निदा साहब को पढ़ना वाकई सुखद अहसास है।

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!

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