Tuesday, July 3, 2012

चु‍ड़‍ियाँ छनछनाई थी.............."फाल्गुनी"

जब सोचा था तुमने
दूर कहीं मेरे बारे में
यहाँ मेरे हाथों की चु‍ड़‍ियाँ छनछनाई थी।
जब तोड़ा था मेरे लिए तुमने
अपनी क्यारी से पीला फूल
यहाँ मेरी जुल्फें लहराई थी।
जब महकी थी कोई कच्ची शाख
तुमसे लिपट कर
यहाँ मेरी चुनरी मुस्कुराई थी।
जब निहारा था तुमने उजला गोरा चाँद
यहाँ मेरे माथे की
नाजुक बिंदिया शर्माई थी।
जब उछाला था तुमने हवा में
अपना नशीला प्यार
यहाँ मेरे बदन में बिजली सरसराई थी।
तुम कहीं भी रहो और
कुछ भी करों मेरे लिए,
मेरी आत्मा ले आती है
तुम्हारा भीना संदेश
मेरे जीवन का बस यही है शेष। 

--स्मृति जोशी "फाल्गुनी"

14 comments:

  1. Vry vry b.ful expression of love..yshoda ji muje to apki kavita bht hi sundar lgi..cngrts..

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  2. खूबसूरत..खूबसूरत ..खूबसूरत

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    1. धन्यवाद राहुल भाई

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  3. कोमल अहसासयुक्त बहुत सुन्दर रचना...
    बहुत सुन्दर..
    :-)

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    1. धन्यवाद रीमा जी

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  4. बहुत सुन्दर....

    सांझा करने का शुक्रिया यशोदा जी.
    सस्नेह
    अनु

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    1. दीदी
      नमस्कार
      शुक्रिया
      सादर

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  5. Replies
    1. आशीष भाई
      धन्यवाद

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  6. प्रेमाभिव्यक्ति से लबरेज़ कविता..
    खूबसूरत..!

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    1. जहे नसीब
      आप आई
      शुक्रिया

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  7. INTNEE DEEP FEELING ....
    PADKAR ANAND AA GAYA ...
    ACCHI PRASTUTI...

    http://www.yayavar420.blogspot.in/

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  8. शुक्रिया सोम

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