Friday, May 3, 2013

मैं प्रेम का मजदूर हूँ.......सुन्दर सृजक




(1)
तुम्हारी ख़ामोशी से हम ख़ाक हुए जाते है......
जलता है खून अपना और हम राख़ हुए जाते है
निचोड़ लेना मेरे कफन को भी तुम मुनाफे की खातिर
ज़िंदगी तो ज़िंदगी मौत तुम्हारे नाम किए जाते है !

(2)
मेरे सपने साकार हो
भले ये दुआ तुम न करना
पर सो संकू चैन से मैं भी
मेरे नींद का न तुम व्यापार करना !

(3)
ये रंजो-गम की दास्ताँ नहीं
रोटी और मोहब्बत का रिश्ता
किसी गरीब से पूछ लो !

(4)
तुम्हारे मुनाफ़े से कोई दुश्मनी नहीं अपनी
मेरे रोटी का नमक तो रहने दो
करोड़ों की ईमारत बनाते रहो
मेरे घर को भी चार दीवारी में जीने दो !

(5 )
मेरे दिन सुहाने नहीं
रात की रंगिनियाँ भी नहीं
पर जी लेने दो,गुजार लेने दो
गुरबत के इन लम्हों को भी मुझे...
याद नहीं शायद कभी दुआओं में
इन्हें ही मांग लिया था.....!

(6 )
वह जाँच रहा था
पाँच सौ का नोट
मानो खंगाल रहा था मुझ को
उससे जीतना चाहता था मैं
जल्द से जल्द....

(7 )
आज़माया खुदा को एक दिन
कुछ ऐसे भी ....
मांग ली ख़ैर अपने दुश्मन की
आज उसका खंजर है मेरे दिल में
पर जुबां पे कोई लफ़्ज़ नहीं......

(8 )
तमाशों का शहर है
हाथों में खाली सही कोई पिटारा लिए रखिए
क्या पता कोई कब अठन्नी उछाल दे
हाथों में अपना बटुआ निकाल रखिए

(9)
खरीद ले गए एक रुपये का पुण्य ,
अपने गुनाह धोने
जैसे धोता है कपड़ा गरीब
एक रुपए में सर्फ़ के पाउच से ....

(10)
तुम जानो मुझे
बस इसलिए कि
पिछले जन्मों की कोई उधारी
हो बाकी मुझपर
इसबार
मैं लौटा सकूँ
तुम्हारे याद दिलाने पर

(11)

देने वालों को संकट में न डालिए
जितनी धरती हो पैरों तले आपके
बस उतना ही आसमान मांगिए .....

(12)
हिचकियाँ आती नहीं गांव में
शहर ने लगा दिया होगा
अहसासों पर जैमर
मुनाफ़ा कम न हो !

(13)
समंदर सूख रहा था
लोग खुश थे
नमक खरोच रहे थे
उसके सूखे जख्मों से

(14)
शब्दों के माफ़िया
लिख रहे जीवन के गीत
जैसे कौवे के घोसले में पल रहा
कोयल के बीज !

(15)
तुम्हारे लिए
मैं भी बना सकता हूँ
दुनिया की सबसे हसीं महल
पर नहीं बसा सकता घर
क्यूंकि जहां भी बनवाए जाते है महल
वही होता है अपना घर
मैं प्रेम का मजदूर हूँ...
 
---सुन्दर सृजक 
https://www.facebook.com/sundar.srijak

प्यास का मारा करता क्या................... श़ायर ज़नाब अन्सार कम्बरी

धूप का जंगल, नंगे पावों, इक बंजारा करता क्या
रेत के दरिया, रेत के झरने, प्यास का मारा करता क्या

बादल-बादल आग लगी थी, छाया तरसे छाया को
पत्ता-पत्ता सूख चुका था, पेड़ बेचारा करता क्या

सब उसके आँगन में अपनी, राम कहानी कहते थे
बोल नहीं सकता था कुछ भी, घर-चौबारा करता क्या

तुमने चाहे चाँद-सितारे, हमको मोती लाने थे
हम दोनों की राह अलग थी साथ तुम्हारा करता क्या

ये है तेरी, और न मेरी, दुनिया आनी-जानी है
तेरा-मेरा, इसका-उसका फिर बँटवारा करता क्या

टूट गये जब बंधन सारे और किनारे छूट गये
बींच भँवर में मैंने उसका नाम पुकारा करता क्या 
-श़ायर ज़नाब अन्सार कम्बरी

Thursday, May 2, 2013

सर चढ़ के बोलता था .. ‘ईमानदारी का नशा’............अमित हर्ष


दिल से निकल गया, .. नज़र से उतर गया
अच्छा हुआ ये भूत ....... सर से उतर गया

घबराहट होगी .. सताएगा अकेलापन बहुत
बुलंदी से मैं फ़क़त इस .. डर से उतर गया

दस्तार रही सलामत .. इज्ज़त भी बच गई
पर इस कोशिश में सर .. धड़ से उतर गया

सर चढ़ के बोलता था .. ‘ईमानदारी का नशा’
अब तो वो खुमार भी ........ अरसे उतर गया

यूं तो यकीं करने को .. यहाँ हमसफ़र बहुत है
पर क्या करें एतबार .. रहगुज़र से उतर गया

--अमित हर्ष

Wednesday, May 1, 2013

वो आवाज दे प्यार से..............प्रीति सुराना



कितनी हसरत थी कि वो आवाज दे प्यार से,
और मैं तड़पकर उनकी बाहों में समा जाऊं,
पर तनहाई के इन लम्हातों में,
अधूरी हसरतों के संग जिंदगी कैसे बिताऊं?


अकसर जश्न-ए-महफिल में जब जिक्र हो बहारों का,
तब चुपके से आ जाते हैं वो मेरे खयालातों में,
ऐसे में बढ़ जाए बेचैनियां तो कहां जाऊं?
अधूरी हसरतों के संग जिंदगी कैसे बिताऊं?


अकसर तनहा रातों में,करूं उनसे बातें जब ख्वाबों में,
ऐसे में जब आ जाए अश्क मेरी इन आंखों में,
ऐसे में वो न आएं तो हाल-ए-दिल किसको सुनाऊं,
अधूरी हसरतों के संग जिंदगी कैसे बिताऊं?


अकसर मेरा दिल मुझको समझाता है हौले से,
गुजर जाएंगे ये दिन भीबस यूंही बातों बातों में,
ऐसे में खुश होकर मैं,मिलन के सपने सजाऊं,
अधूरी हसरतों के संग जिंदगी कैसे बिताऊं?........

Monday, April 29, 2013

जिन्दगी डराती है...................डॉ. मधुसूदन चौबे


बहुत ही महीन हाथों से सिर दबाती है
दर्द होने पर, माँ अक्सर याद आती है 

तारा बनकर चमक रही है आकाश में
उसकी रोशनी मेरे दिल तक आती है 


इतनी उम्र में भी नन्हा समझती रही
अब भी उंगली पकड़ रास्ता बताती है


तू थी, तो सब ठीक चलता था माँ
तेरे बिना जिन्दगी बहुत ही डराती है


आंसू न बहा, अब चुप हो जा ‘मधु’
तेरे रोने से तो माँ बहुत घबराती है 





-डॉ. मधुसूदन चौबे [२९-०४-१३] [२] [५१] [१८३]
१२९, ओल्ड हाऊसिंग बोर्ड कालोनी, बडवानी [म. प्र.]
मो. ७४८९०१२९६७

Sunday, April 28, 2013

तेरा क्या जाता.............हरि पौडेल




चन्द लम्हा और गुजर जाता, तो तेरा क्या जाता
ये रात गर तेरी खुशबू ले जाती, तो तेरा क्या जाता

प्यासी नजरों से कोइ देखे, तो शिकायत ही क्यों ?
महफिल मे गर रौनक आ जाती, तो तेरा क्या जाता

तेरी पायल की झंकार से जाग पडते ये मरते मजनू
बंजर पड़े बाग मे गर बहार आती, तो तेरा क्या जाता

लड़खडाते हुए गुज़र रहे है कई प्यासे तेरी गलियों मे 
ज़ाम टकराए गर सम्हलने के लिए, तो तेरा क्या जाता

शोहरत सुन के ही आए है ये दीवाने इस महफिल मे
नज़ाकत से तेरी गर पाते है सुकूँ, तो तेरा क्या जाता

--हरि पौडेल
सम्पादनः यशोदा दिग्विजय अग्रवाल
मूल रचना कृपया यहाँ पढ़े

यहाँ कुछ तस्वीरें हैं, लक्ष्मी वाहन उल्लू की...,,,,,,,,,,,फारवर्ड फॉर ऑल

Stunning Photos of Camouflaged Owls Can You Spot Them?

Owls are fierce predators, but even they have to sleep from time to time. When they do, they are exposed to bigger predators as well as 'mobbing' by smaller prey animals. Mobbing means smaller animals band together to fight off the owl's feared attacks.

Certain types of birds, when identifying an owl on their turf, might band together to harass and fight the owl and chase it off. Also, owls rely on stealth and surprise when hunting, and so a good camouflage can be the difference between dinner and going to sleep on an empty stomach.

यहाँ कुछ तस्वीरें हैं, लक्ष्मी वाहन उल्लू की...   
प्रकृति के अनुसार अपने रंगों में परिवर्तन करता है

चलिये ! इन तस्वीरों में उल्लू को पहचानिये ...



















यहाँ पर प्रस्तुत सभी चित्र व जानकारी हमें याहू ग्रुप फारवर्ड फॉर ऑल से प्राप्त हुई है
हम
याहू ग्रुप फारवर्ड फॉर ऑल के आभारी हैं