Sunday, July 7, 2019

"फिक्र".....मीना भारद्वाज

मेरी कुछ यादें और उम्र के अल्हड़ बरस ।
अब भी रचे-बसे होंगें उस छोटे से गाँव में ।।

जिसने ओढ़ रखी है बांस के झुरमुटों की चादर ।
और सिमटा हुआ है ब्रह्मपुत्र की बाहों में ।।

आमों की बौर से लदे सघन कुंजों से ।
      पौ फटते ही कोयल की कुहूक गूँजा करती थी ।।

गर्मी की लूँ सी हवाएँ बांस के झुण्डों से ।
सीटी सी सरगोशी लिए बहा करती थी ।।

हरीतिमा से ढका एक छोटा सा घर ।
मोगरे , चमेली और गुलाबों सा महकता था ।।

अमरूद , आम और घने पेड़ों  के बीच ।
हर दम सोया सोया सा रहता था ।।

बारिशों के मौसम में उसकी फिक्र सी रहने लगी है ।
नाराजगी में नदियाँ गुस्से का इजहार करने लगी हैं ।।


लेखक परिचय - मीना भारद्वाज 

13 comments:

  1. बहुत सुन्दर सृजन आदरणीया
    सादर

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (08-07-2019) को "चिट्ठों की किताब" (चर्चा अंक- 3390) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. वाह बहुत सुंदर प्रस्तुति सखी मीनाजी।सादर

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  4. मीना जी आप की ये प्यारी रचना तो बचपन की अल्हड़ यादे और गांव की छाँव में ले जा रही हैं, सादर

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  5. बहुत सुंदर सरस प्रस्तुति मीना जी मन में कहीं अनुराग सा जगाती।
    बहुत सुंदर एहसास पिरोए हैं आपने।

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    1. सादर आभार आप सभी का... मेरे सृजन को मान देने हेतु ।

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  6. बहुत सुंदर प्रस्तूति, मीना दी।

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  7. सुन्दर प्रस्तुति

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  8. वाह!!मीना जी ,बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति!

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  9. बहुत सुंदर शब्द चित्र।

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  10. बहुत ही सुन्दर प्यरी सी कविता

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