Wednesday, July 31, 2019

ग्लेशियर... पूजा प्रियम्वदा

एक डाह है रूह में 
जैसे तेरी उपेक्षा का 
जलता कोयला 
छू गया हो

जले हुए घाव सुना 
सालों तक उतारते हैं 
एक काले लम्हे की पपड़ी 
और निशान 
रह जाता है फिर भी

इस जिस्म के 
सुप्त ज्वालामुखी में 
मेरी रूह का ग्लेशियर 
पिघलने लगा है

बूंदों के वाष्प बनने से 
पहले न लौटो तो 
लावे के नमक में 
चख लेना मुझे !
-पूजा प्रियम्वदा


3 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 1.8.19 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3414 में दिया जाएगा

    धन्यवाद

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