Thursday, July 18, 2019

कुछ यूँ लगा जैसे....मीना शर्मा

छूकर मेरी पलकें मेरा सपना चला गया
कुछ यूँ लगा जैसे कोई अपना चला गया !

खाली पड़ा हुआ था, जो मुद्दत से बंद था
रहकर उसी मकान में मेहमां चला गया !

ले गया कोई हमें, हमसे ही लूटकर
इक अजनबी के संग दिल-ए-नादां चला गया !

आँखें तो कह रही थीं, रोक लो अगर चाहो
जाने के बाद फिर ये ना कहना - चला गया !

मंज़िल को ढ़ूँढ़ती रहीं कुछ गुमशुदा राहें
ना जाने कब, यहाँ से कारवां चला गया !

वो शौक, वो फ़ितूर, वो दीवानगी कहाँ ?
बारिश में भीगने का जमाना चला गया !

अब घोंसलों को तोड़कर बनते हैं घरौंदे
चिड़िया का इस शहर से आशियां चला गया !!!


लेखक परिचय -  मीना शर्मा 

5 comments:

  1. वाह !बेहतरीन सृजन प्रिय मीना दी जी
    आप की हर रचना कमाल की होती है
    सादर

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (19-07-2019) को "....दूषित परिवेश" (चर्चा अंक- 3401) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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