Saturday, May 26, 2018

अगन बरसती आसमां से....कुसुम कोठारी

अगन बरसती आसमां से जाने क्या क्या झुलसेगा
ज़मीं तो ज़मीं खुद तपिश से आसमां भी झुलसेगा

जा ओ जेठ मास समंदर में एक दो डुबकी लगा
जिस्म तेरा काला हुवा खुद तू भी अब झुलसेगा

ओढ़ के ओढ़नी रेत की  पसरेगा तू बता कहां 
यूं बेदर्दी से जलता रहा तो सारा संसार झुलसेगा

देख आ एक बार किसानों की जलती आंखों में
उजड़ी हुई फसल में उनका सारा जहाँ झुलसेगा

प्यासे पाखी प्यासी धरती प्यासे मूक पशु बेबस
सूरज दावानल बरसाता तपिश से चांद झुलसेगा 

ना इतरा अपनी जेष्ठता पर समय का दास है तू
घिर आई सावन घटाऐं फिर भूत बन तू झुलसेगा।
 -कुसुम कोठारी


16 comments:

  1. सादर आभार सखी दी मेरी पोस्ट को धरोहर मे स्थान मिला।

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  2. अति सुन्दर ...हमेशा की तरह बेहतरीन भाव रचना
    शब्द शब्द तपन दोपहरी
    पढ़ते पढ़ते झुलस गये
    सावन की जो बात हुई तो
    हम भी थोड़ा सरस गये !

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    1. सस्नेह आभार मीता

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (27-05-2018) को "बदन जलाता घाम" (चर्चा अंक-2983) (चर्चा अंक-2969) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. सादर आभार आदरणीय

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    1. जी सादर आभार ।

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  6. वाह!!!बहुत ही सुन्दर रचना...
    जेठ की तपिश और किसानों का दर्द ।

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    1. ढेर सा स्नेह आभार सखी।

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  7. सच,कोई पसंद नहीं करता इस ज्येष्ठ की तपिश को....हर कोई यही चाहता है कि जल्दी इससे जल्दी छुटकारा मिले ! सुंदर रचना।

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    1. जी मीना जी सब को पता है सूरज तपता है तभी मेघों को नीर मिलता है, जेठ जलता है तभी आषाढ़ सरसता है, सावन बरसता है ।
      बस गर्मी असहनीय होती जा रही है पर्यावरण से छेड-छाड़ के कारण।
      ढेर सा स्नेह आभार ।

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  8. बहुत सुन्दर सृजन ।

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    1. बहुत बहुत सादरआभार मीना जी।

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  9. बेशकीमती ये सावन भी आएगा तू इंतज़ार तो कर
    आग से ये सोना खरा भी होगा तू इंतज़ार तो कर

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  10. सुन्दर , सामयिक प्रस्तुति !
    हार्दिक बधाई !!

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