Sunday, January 7, 2018

कठपुतली.....ज्योति साह


बना के कठपुतली नचाते रहो
रखो दोनों शिराओं को तलवे के नीचे
हमारा क्या है.....

तुम कहो तो हम उठें
तुम कहो तो बैठे

चाहो तो सांस लेने के भी
समय तय कर दो
और जब भी तुम बोलो
हम बजा दें ताली,

हाँ एक रस्सी भी 
बाँध दो टाँगों में
ताकि कहीं और का रूख 
ना कर सकें

बिठा दो पहरे आँखों पर
तुम्हारे दिखाये के सिवा 
कुछ देख ना सके,

सिल दो होंठ
कि तुम्हारे चाहे बिना
उसे हिला भी ना सकूं,

जकड़ दो पंखों को
कि लाख कोशिशों के बाद भी
स्वच्छन्द उड़ान भर ना सकूँ,

सुनो...
भले डाल दो काल-कोठारी में
बस एक झरोख़ा खुला रखना
ताकि जब निकले तुम्हारी झाँकी
झंडा फहराने को
तो जी भर उसे निहार सकूँ,

तुम्हारी जीत
और अपनी हार पे
सिर्फ़ और सिर्फ़ कुछ आँसू बहा सकूँ।


-ज्योति साह

11 comments:

  1. वाह्ह्ह....लाज़वाब👌👌

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  2. अति सुंदर रचना

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  3. घुटते एहसास आखिर बोल पडे।
    निशब्द रचना बोलते भाव।
    लाजवाब।

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  4. बेहतरीन प्रस्तुतिकरण

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  5. क्‍या खूब लिखा है ज्‍योति जी ने..जकड़ दो पंखों को
    कि लाख कोशिशों के बाद भी
    स्वच्छन्द उड़ान भर ना सकूँ,....

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  6. बहुत खूब लिखा है

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  7. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (08-01-2018) को "बाहर हवा है खिड़कियों को पता रहता है" (चर्चा अंक-2842) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

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  8. लाजवाब रचना
    वाह!!!

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