Friday, January 12, 2018

त्रिवेणी.....विभा रानी श्रीवास्तव

बड़ी दीदी की लिखी त्रिपदियाँ
चातक-चकोर को मदमस्त होते भी सुना है !
ज्वार-भाटे को उसे देख उफनते भी देखा है !

यूँ ही नहीं होता माशूकों को चाँद होने का गुमाँ !!
......
रब एक पलड़े पर ढेर सारे गम रख देता है !
दूसरे पलड़े पर छोटी सी ख़ुशी रख देता है !

महिमा तुलसी के पत्ते के समान हुई !!
......
टोकने वाले बहुत मिले राहों के गलियारों में !
जिन्हें गुमान था कि वही सयाने हैं टोली में !

कामयाबी पर होड़ में खड़े दे रहे बधाई मुझे !!
......
नफ़रत सुलगाती हैं ख़ौफ़ ए मंज़र
उल्फ़त मोड देती है नोक ए खंजर

क्यूँ बुनता है ताने बाने साज़िशों के हरदम

- विभारानी श्रीवास्तव

7 comments:

  1. आभारी हूँ 🙏
    सस्नेहाशीष संग शुक्रिया छोटी बहना 😊🌹

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  2. 👏👏👏सुंदर रचना

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  3. बहुत ही सुंदर दी जी।
    चांद चकोर से लेकर सीर फरहाद
    सलीम अनार कली तक सब समाहित हो गया एक छोटे से काव्य मे।
    गागर मे सागर।

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  4. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (13-01-2018) को "कुहरा चारों ओर" (चर्चा अंक-2846) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हर्षोंल्लास के पर्व लोहड़ी की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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