Wednesday, January 10, 2018

जीवन और तुषार बूंद!! ....कुसुम कोठारी


निलंबन हुवा नीलाम्बर से 
भान हुवा अच्युताका कुछ क्षण
गिरी वृक्ष चोटी, इतराई 
फूलों पत्तों दूब पर देख 
अपनी शोभा मुस्काई, 
गर्व से अपना रूप मनोहर 
आत्म प्रशंसा भर लाया 
सूर्य की किरण पडी सुनहरी 
अहा शोभा द्विगुणीत हुई !
भाव अभिमान के थे अब उर्धमुखी 
हाँ, भूल गई "मैं "
अब निश्चय है अंतःपास मे 
मै तुषार बूंद नश्वर, भूली अपना रूप 
कभी आलंबन अंबर का 
कभी तृण सहारे सा अस्तित्व 
पर आश्रित नाशवान शरीर 
"मैं"आत्मा अविनाशी 
भूल गई क्यों शुद्ध स्वरूप। 
-कुसुम कोठारी


8 comments:

  1. वाह
    बेहद सुंदर भावाभिव्यक्ति

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    1. सादर आभार दी जी।
      शुभ संध्या।

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  2. Replies
    1. सादर आभार।
      शुभ संध्या ।

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  3. बहुत खूब
    मन को भा गई आप की शानदार रचना

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    1. ढेर सा आभार मित्र जी।

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  4. बहुत सा आभार दी मेरी रचना को आपकी धरोहर मे देख मुझे जो आत्मानुभुति हुई वो अप्रतिम है।
    पुनः आभार दी सनेह बनाये रखें।

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  5. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 11-01-2018 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2845 में दिया जाएगा

    धन्यवाद

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