Saturday, December 23, 2017

शीत के बाण.......डॉ. इन्दिरा गुप्ता


जाड़ा चाबुक पीठ पर 
धाँय धाँय बरसाये 
निर्धनता बेबस होकर 
बिलख बिलख रही जाये ! 

झीनी सी ये गुदड़ी 
कब तक ठण्ड बचाय 
सर्दी भूख और गरीबी 
सदा झगड़ती जाय ! 

कोहरा भर गया झोपड़ी 
गला रहा है हाड 
दिन दूनों रात चौ गुनो 
लहू जमातों जाय ! 

जाड़ा बैरी दरिद्र को 
शीत लहर तड़पाय 
जर्रा जर्रा कोमल काया 
जाड़े से थर्राये ! 

इत ओढ़ रजाई धुँध की 
सो गया है दिनकर भी 
धूप से कुछ मिलती गर्मी 
शीत मिटाती तनि सी ! 

निर्धन का नहीँ कोई सहाई 
ईश्वर ना इन्सान 
समय ऐसा विकट है 
बदली सबकी चाल ! 

डॉ. इन्दिरा गुप्ता ✍


6 comments:

  1. संवेदनशील रचना....

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  2. बहुत सुंदर रचना....अप्रतिम

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (24-12-2017) को "ओ मेरे मनमीत" (चर्चा अंक-2827)

    पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. सुन्दर रचना

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  5. आपकी लिखी रचना सोमवार 8 जनवरी 2018 के 906 वें अंक के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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