Wednesday, December 20, 2017

विराने समेटे.......कुसुम कोठारी

विराने समेटे कितने पद चिन्ह
अपने हृदय पर अंकित घाव
जाता हर पथिक छोड छाप
अगनित कहानियां दामन मे
जाने अन्जाने राही छोड जाते
एक अकथित सा अहसास
हर मौसम गवाह बनता जाता
बस कोई फरियादी ही नही आता
खुद भी साथ चलना चाहते हैं
पर बेबस वहीं पसरे रह जाते हैं
कितनो को मंजिल तक पहुंचाते
खुद कभी भी मंजिल नही पाते
कभी किनारों पर हरित लताऐं झूमती
कभी शाख से बिछडे पत्तों से भरती
कभी बहार , कभी बेरंग मौसम
फिर भी पथिक निरन्तर चलते
नजाने कब अंत होगा इस यात्रा का
यात्री बदलते  रहते निरन्तर
राह रहती चुप शांत बोझिल सी।
विराने समेटे..
- कुसुम कोठारी 

11 comments:

  1. बहुत ही खूबसूरत अशआर

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  2. बहुत सुंदर
    बहुत ही शानदार रचना
    आप कुछ भी लिखे
    मन को भा ही जाता है

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    1. आपका स्नेह यूं ही मिलता रहे मित्र जी।
      आभार हृदय तल से।

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  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 21-12-2017 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2824 में दिया जाएगा

    धन्यवाद

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  4. आदरणीय यशोदा दी मेरी रचना को आपकी धरोहर मे शामिल करने का बहुत बहुत आभार। आपका स्नेह आगे के लेखन को प्रोत्साहित करता है।

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  5. आपने जिस तरह राह को एक महसूस करने वाला किरदार बना दिया है, वो बहुत अच्छा लगा। आपकी कविता पढ़कर ये सोचने लगा की सच में हम सब अपनी यात्राओं में चलते रहते हैं, बदलते रहते हैं, पर रास्ता वहीं ठहरकर सब देखता रहता है। वह हर क़दम, हर मौसम, हर मुलाकात को अपने भीतर संभाल लेता है।

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