Saturday, January 13, 2018
Friday, January 12, 2018
त्रिवेणी.....विभा रानी श्रीवास्तव
बड़ी दीदी की लिखी त्रिपदियाँ
चातक-चकोर को मदमस्त होते भी सुना है !
ज्वार-भाटे को उसे देख उफनते भी देखा है !
यूँ ही नहीं होता माशूकों को चाँद होने का गुमाँ !!
......
रब एक पलड़े पर ढेर सारे गम रख देता है !
दूसरे पलड़े पर छोटी सी ख़ुशी रख देता है !
महिमा तुलसी के पत्ते के समान हुई !!
......
टोकने वाले बहुत मिले राहों के गलियारों में !
जिन्हें गुमान था कि वही सयाने हैं टोली में !
कामयाबी पर होड़ में खड़े दे रहे बधाई मुझे !!
......
नफ़रत सुलगाती हैं ख़ौफ़ ए मंज़र
उल्फ़त मोड देती है नोक ए खंजर
क्यूँ बुनता है ताने बाने साज़िशों के हरदम
- विभारानी श्रीवास्तव
Thursday, January 11, 2018
अलाव....प्रतिमा भारती

हर तरह कर ली कोशिश
कि गुज़र जाए रात......
फिर भी ज़रूरत पड़ ही गयी
बुझती यादों के सायों की।
इन्हीं को जला के अलाव
की कोशिश
कुछ गरमाहट दें एहसासों को
कि नई किरण के साथ
जग जाएँ रिश्ते ....
नई सुबह के लिए।।

-प्रतिमा भारती
Wednesday, January 10, 2018
जीवन और तुषार बूंद!! ....कुसुम कोठारी

निलंबन हुवा नीलाम्बर से
भान हुवा अच्युताका कुछ क्षण
गिरी वृक्ष चोटी, इतराई
फूलों पत्तों दूब पर देख
अपनी शोभा मुस्काई,
गर्व से अपना रूप मनोहर
आत्म प्रशंसा भर लाया
सूर्य की किरण पडी सुनहरी
अहा शोभा द्विगुणीत हुई !
भाव अभिमान के थे अब उर्धमुखी
हाँ, भूल गई "मैं "
अब निश्चय है अंतःपास मे
मै तुषार बूंद नश्वर, भूली अपना रूप
कभी आलंबन अंबर का
कभी तृण सहारे सा अस्तित्व
पर आश्रित नाशवान शरीर
"मैं"आत्मा अविनाशी
भूल गई क्यों शुद्ध स्वरूप।
-कुसुम कोठारी
Tuesday, January 9, 2018
कुछ क्षणिकाएँ.....प्रतिमा भारती
सोंधी खुशबू
......................
शब्द गुमसुम हों तो क्या...।
हँसी की धूप दिखाओ ...
जितनी भी ...।
दर्द बरसेगा जब भी
मन के आँगन में...
हवा में होगी
उसकी सोंधी खुशबू...।।
नियति
.........................
जानती हूँ
पहचानती भी हूँ
’नियति’
फिर भी ...
शब्दों का लबादा ओढ़े
वह...।
जल्लाद सी नज़र आती है ।।
दिल की बातें
..............................
आओ बैठें
कुछ अधलेटे कुछ उन्नीदे से
दिल की हरी नर्म ज़मीन पर....
सहलाएँ...नोचें...बिखराएँ ...फैलाएँ और उड़ाएँ
भावनाओं और संवेदनाओं की दूब...
बातें करें कुछ बिखरी बिखरी फैली बेतरतीब सी...
वैसी ही जैसी होती हैं बातें....
दिल से दिल के करीब की.....
बहाना
................................
मत कुरेदो ...
बहुत कुछ होगा अनावृत ...
बहुत कुछ ऐसा
जो है
अनपेक्षित... , असहनीय..., अशोभनीय ...,
है मेरे भी भीतर
क्योंकि
मेरे पास भी
है बहाना
इंसान होने का ।।
Monday, January 8, 2018
छह हाइकु.....विभा रानी श्रीवास्तव
1
ठूँठ का मैत्री
वल्लरी का सहारा
मर के जीया।
2
शीत में सरि
स्नेह छलकाती स्त्री
फिरोजा लगे।
3
गरीब खुशियाँ
बारम्बार जलाओ
बुझे दीप को।
4
क्षुधा साधन
ढूंढें गौ संग श्वान
मिलते शिशु।
5
आस बुनती
संस्कार सहेजती
सर्वानन्दी स्त्री।
सर्वानन्दी = जिसको सभी विषयों में आनंद हो
6
स्त्री की त्रासदी
स्नेह की आलिंजर
प्रीत की प्यासी।
-विभा रानी श्रीवास्तव
Sunday, January 7, 2018
कठपुतली.....ज्योति साह

बना के कठपुतली नचाते रहो
रखो दोनों शिराओं को तलवे के नीचे
हमारा क्या है.....
तुम कहो तो हम उठें
तुम कहो तो बैठे
चाहो तो सांस लेने के भी
समय तय कर दो
और जब भी तुम बोलो
हम बजा दें ताली,
हाँ एक रस्सी भी
बाँध दो टाँगों में
ताकि कहीं और का रूख
ना कर सकें
बिठा दो पहरे आँखों पर
तुम्हारे दिखाये के सिवा
कुछ देख ना सके,
सिल दो होंठ
कि तुम्हारे चाहे बिना
उसे हिला भी ना सकूं,
जकड़ दो पंखों को
कि लाख कोशिशों के बाद भी
स्वच्छन्द उड़ान भर ना सकूँ,
सुनो...
भले डाल दो काल-कोठारी में
बस एक झरोख़ा खुला रखना
ताकि जब निकले तुम्हारी झाँकी
झंडा फहराने को
तो जी भर उसे निहार सकूँ,
तुम्हारी जीत
और अपनी हार पे
सिर्फ़ और सिर्फ़ कुछ आँसू बहा सकूँ।

-ज्योति साह
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