Saturday, January 12, 2019

तुम मुझे मिलीं ....पंकज चतुर्वेदी

तमाम निराशा के बीच
तुम मुझे मिलीं 
सुखद अचरज की तरह 
मुस्कान में ठिठक गए 
आंसू की तरह 

शहर में जब प्रेम का अकाल पड़ा था 
और भाषा में रह नहीं गया था 
उत्साह का जल 

तुम मुझे मिलीं 
ओस में भीगी हुई 
दूब की तरह 
दूब में मंगल की 
सूचना की तरह 

इतनी धूप थी कि पेड़ों की छांह 
अप्रासंगिक बनाती हुई 
इतनी चौंध 
कि स्वप्न के वितान को 
छितराती हुई 

तुम मुझे मिलीं 
थकान में उतरती हुई 
नींद की तरह 

नींद में अपने प्राणों के 
स्पर्श की तरह 
जब समय को था संशय 
इतिहास में उसे कहां होना है 
तुमको यह अनिश्चय 
तुम्हें क्या खोना है 
तब मैं तुम्हें खोजता था 
असमंजस की संध्या में नहीं 
निर्विकल्प उषा की लालिमा में 

तुम मुझे मिलीं 
निस्संग रास्ते में 
मित्र की तरह 
मित्रता की सरहद पर 
प्रेम की तरह

-पंकज चतुर्वेदी
काव्य-धरा




5 comments:

  1. आदरणीय पंकज जी, इस अति उम्दा सृजन के लिए आपको ढेरों शुभकामनाएँ
    तुम मुझे मिलीं
    थकान में उतरती हुई
    नींद की तरह ... इस पंक्ति ने मन को जीत लिया

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (13-01-2019) को "उत्तरायणी-लोहड़ी" (चर्चा अंक-3215) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    उत्तरायणी-लोहड़ी की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. बहुत सुंदर रचना .....पंकज जी सादर नमन

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  4. सुन्दर प्रस्तुति

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