Friday, January 11, 2019

बेहिसी के ज़ख्म......डॉ. अंजुम बाराबंकवी

प्यार के हर रंग को दस्तूर होना चाहिए,
ये गुज़ारिश है इसे मंजूर होना चाहिए।

फूल से चेहरे पर इतनी बरहमी अच्छी नहीं,
जानेमन गुस्से को अब काफूर होना चाहिए।

आजकल संजीदगी से अहले-दिल कहने लगे,
बेहिसी के ज़ख्म को नासूर होना चाहिए।

काटते रहते हैं जो बेरूह लफ्ज़ों का पहाड़,
उनको श़ायर तो नहीं मज़दूर होना चाहिए।

शोहरतों के फूल क़दमों में पड़े हैं देखिए,
आप को थोड़-बहुत मग़रूर होना चाहिए।

दिल के क़िस्से में चटकना-टूटना है सब फूजूल,
अब तो इस शीशे को चकनाचूर होना चाहिए।

कैसे-कैसे लोग ना क़दरी से पीले पड़ गए,
जिनको दुनिया में बहुत मशहूर होना चाहिए।
-डॉ. अंजुम बाराबंकवी

3 comments:

  1. वाह बहुत खूब तंज लिये उम्दा शेर।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (12-01-2019) को "मेरा विकास - सबका विकास" (चर्चा अंक-3214) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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