Saturday, December 15, 2018

मैं हूँ पर तुम-सी....दीप्ति शर्मा

पिता
मेरी धमनियों में दौड़ता रक्त
और तुम्हारी रिक्तता
महसूस करती मैं,
चेहरे की रंगत का तुमसा होना
सुकून भर देता है मुझमें
मैं हूँ पर तुम-सी
दिखती तो हूँ खैर
हर खूबी तुम्हारी पा नहीं सकी
पिता
सहनशीलता तुम्हारी,
गलतियों के बावजूद मॉफ करने की
साथ चलने की
सब जानते चुप रहने की 
मुझे नहीं मिली 
मैं मुँहफट हूँ कुछ,  तुमसी नहीं
पर होना चाहती हूँ
सहनशील 
तुम्हारे कर्तव्यों सी निष्ठ बन जाऊँ एक रोज
पिता
महसूस करती हूँ 
मुरझाए चेहरे के पीछे का दर्द
तेज चिडचिडाती रौशनी में काम करते हाथ
कौन कहता है पिता मेहनती नहीं होते
उनकी भी बिवाइयों में दरार नहीं होती है
चेहरे पर झुर्रियां 
कलेजे में अनगिनत दर्द समेटे
आँखों में आँसू छिपा
प्यार का अथाह सागर
होता है पिता
तुम 
सागर हो
आकाश हो
रक्त हो
बीज हो 
मुझमें हो 
बस और क्या चाहिए
पिता
जो मैं हूबहू तुमसी हो जाऊँ ।
-दीप्ति शर्मा

8 comments:

  1. बहुत ही सुन्दर रचना

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  2. माँ पर अनगिनत रचनाएँ किन्तु पिता की साहित्य-जगत में नितांत उपेक्षा ! दीप्ति जी, आपकी कविता ने इस कमी को पूरा करने की सार्थक कोशिश की है. माँ तो बोल भी लेती है और रो भी लेती है लेकिन पिता बोलता भी कम है और रोने में शर्माता भी बहुत है. संतान के प्यार का हक़दार तो यह मूक व्यक्ति भी होना चाहिए.

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  3. वाह ! मर्मस्पर्शी.

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  4. सुंदर और भावपूर्ण रचना

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  5. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा आज रविवार (16-12-2018) को "समझौता" (चर्चा अंक-3187) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  6. सुन्दर रचना

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