Saturday, December 1, 2018

अक्षर.....डॉ. जगदीश व्योम


अक्षर कभी क्षर नहीं होता
इसीलिए तो वह ’अक्षर’ है
क्षर होता है तन
क्षर होता है मन
क्षर होता है धन
क्षर होता है अज्ञन
क्षर होता है मान और सम्मान
परंतु नहीं होता है कभी क्षर
’अक्षर’ 
इसलिए अक्षरों को जानो
अक्षरों को पहचानो
अक्षरों को स्पर्श करो
अक्षरों को पढ़ो
अक्षरों को लिखो
अक्षरों की आरसी में अपना चेहरा देखो
इन्हीं में छिपा है 
तुम्हारा नाम
तुम्हारा ग्राम
और तुम्हारा काम
सृष्टि जब समाप्त हो जोगी
तब भी रह जाएगा ’अक्षर’
क्यों कि ’अक्षर’ तो ब्रह्म है
और भला-
ब्रह्म भी कहीं मरता है?
आओ! बाँचें 
ब्रह्म के स्वरूप को 
सीखकर अक्षर 
-डॉ. जगदीश व्योम

7 comments:

  1. बहुत सुन्दर

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  2. बहुत ही बेहतरीन रचना

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (02-12-2018) को "अनोखा संस्मरण" (चर्चा अंक-3173) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. एक भिन्न कृति। बेहतरीन।

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  5. वाह बहुत सुंदर।

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