Friday, April 27, 2018

बालों पे चांदी सी चढ़ी थी.....निधि सिंघल

ज़िन्दगी से लम्हें चुरा
पर्स में रखती रही!

फुरसत से खरचूंगी
बस यही सोचती रही।

उधड़ती रही जेब
करती रही तुरपाई
फिसलती रही खुशियाँ
करती रही भरपाई।

इक दिन फुरसत पायी
सोचा .......
खुद को आज रिझाऊं
बरसों से जो जोड़े
वो लम्हें खर्च आऊं।

खोला पर्स..लम्हें न थे
जाने कहाँ रीत गए!

मैंने तो खर्चे नही
जाने कैसे बीत गए !!

फुरसत मिली थी सोचा
खुद से ही मिल आऊं।

आईने में देखा जो
पहचान ही न पाऊँ।

ध्यान से देखा बालों पे
चांदी सी चढ़ी थी,
थी तो मुझ जैसी
जाने कौन खड़ी थी।
-निधि सिंघल

11 comments:

  1. यथार्थ नीधी बहुत सुंदर लिखा आपने सत्य का आभास

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  2. आखिरी 4 पंक्तियां मन में उतर गयी...वाह!

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (28-04-2017) को "यह समुद्र नहीं, शारदा सागर है" (चर्चा अंक-2954) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. वाह अप्रतिम रचना ..
    वक़्त किसी का कहाँ हुआ.जब फुर्सत मिलती है तो हाथ खाली मिलते हैं.

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  5. नोस्तालाजिक अहसास मन को छूते हुए! बधाई और आभार!!!

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  6. बहुत खूबसूरत रचना।
    लिखते रहिये यही कामना।

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  7. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 29 एप्रिल 2018 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  8. बीती जिंदगानी
    मन करे नादानी
    तन दे न साथ
    मल रहे हैं हाथ।

    बैठे हैं उदास
    समय करें है उपहास।



    शास्वत सत्य बयां करती रचना


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  9. सुंदर रचना

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  10. "This to mujh jaisi, jaane kaun khadi thi" - bahut sundar!

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