Thursday, April 26, 2018

अस्तित्व..... और अस्मिता बचाने की लडाई......कुसुम कोठारी


अस्तित्व..... 
और अस्मिता बचाने की लडाई
खूब लडो जुझारू हो कर लड़ो
पर रुको 
सोचो ये सिर्फ 
अस्तित्व की लड़ाई है या 
चूकते जा रहे 
संस्कारों की प्रतिछाया... 

जब दीमक लगी हो नीव मे
फिर हवेली कैसे बच पायेगी 
नीव को खाते खाते
दिवारें हिल जायेगी
एक छोटी आंधी भी
वो इमारत गिरायगी
रंग रौगन खूब करलो
कहां वो बच पायेगी।

नीड़ तिनकों के तो सुना
ढहाती है आंधियां
घरौंदे माटी के भी 
तोडती है बारिशें
संस्कारों की जब
टूटती है डोरिया
उन कच्चे धागों पर कैसे
शामियाने  टिक पायेंगे।

समय ही क्या बदला है 
या हम भी हैं बदले बदले
नारी महान है माना
पर रावण, कंस भी पोषती है
सीता और द्रोपदी
क्या इस युग की बात है
काल चक्र मे सदा ही
विसंगतियां पनपती है।

पर अब तो दारुण दावानल है
जल रहा समाज जलता सदाचरण है
क्या होगा अंत गर ये शुरूआत है
केशव तो नही आयेंगे ये निश्चित है
कुछ  ढूंढना होगा इसी परिदृश्य मे 
अस्मिता का युद्ध स्वयं लड़ना होगा
संयम और संस्कारों को गढ़ना होगा।
 - कुसुम कोठारी

13 comments:

  1. वाह वाह वाह निशब्द हूँ मीता

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  2. वाह 👏 बहुत खूबसूरत रचना. सच है कि अब केशव नहीं आएंगे. अपनी अस्मिता को खुद बचाना है.

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    1. जी सखी अपना अस्तित्व अपनी धरोहर है स्वयं ही बचाना होगा।
      स्नेह आभार ।

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  3. बहुत खूब लिखा आप ने

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    1. बहुत बहुत आभार सखी।

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  4. कुछ उजड़ी हैं विरासतें
    कुछ उजड़ना बाकी है
    लगी कुछ देर और तो
    नजारा ही देखना बाकी है.
    उमीद एक संस्कारो से है थोड़ी
    और सारे उपाय तो जाली हैं.

    उम्दा रचना

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    1. वाह बहुत सार्थक आपकी पंक्तियां रचना को आगे बढ़ाती।
      सादर आभार।

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  5. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 30 अप्रैल 2018 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  6. सादर आभार सखी दी मेरी रचना ने आपकी धरोहर मे अस्तित्व बनाया।

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  7. समय ही क्या बदला है
    या हम भी हैं बदले बदले
    नारी महान है माना
    पर रावण, कंस भी पोषती है
    सीता और द्रोपदी
    क्या इस युग की बात है
    काल चक्र मे सदा ही
    विसंगतियां पनपती है।
    एक एक वाक्य कठोर प्रहार करता हुआ ! सच का सामना कराती सशक्त रचना !

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