Wednesday, October 15, 2014

तन्हा यहाँ हर शहर हुआ.............जितेन्द्र 'सुकुमार'

 

गाँव हुआ न मेरा शहर हुआ
क्‍यूं हर शय बेखबर हुआ

महफिल हो न सकी हमारी
अपना तो बस ये दोपहर हुआ

मुसाफिर की तरह चल रहें
चलना इधर - उधर हुआ

आफ़ताबे तब्जूम कैसे करे
खामोश हर सफर हुआ

मंजिल की तलाश रही पर
न बसेरा, न कोई घर हुआ

भीड़ ही दिखायी देती रही मुझे
तन्हा यहाँ हर शहर हुआ

-जितेन्द्र 'सुकुमार' 
' उदय आशियाना ' चौबेबांधा 
राजिम जिला- गरियाबंद, (छग.) - 493 885 

प्राप्ति स्रोत : विचार वीथी

 

4 comments:

  1. अनुपम रचना...... बेहद उम्दा और बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपको बहुत बहुत बधाई...

    नयी पोस्ट@बड़ी मुश्किल है बोलो क्या बताएं

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