Thursday, October 2, 2014

भरोसा.............पवन करण
















भरोसा
अब भी मौजूद है दुनिया में
नमक की तरह

अब भी

पेड़ों के भरोसे पक्षी
सब कुछ छेड़ जाते हैं

बसंत के भरोसे वृक्ष
बिलकुल रीत जाते हैं

पतवारों के भरोसे नांव
संकट लांघ जाती है

बरसात के भरोसे बीज
धरती में समा जाते हैं

अनजान पुरुष के पीछे
सदा के लिये स्त्री चल देती है

-पवन करण
जन्मः 18 जून,1964
ग्वालियर म.प्र.

6 comments:

  1. अति सुन्दर भावों का संचरण

    अंजान क्षितिज की ओर चली
    ले नव जीवन की डोर चली
    चल पड़े जिधर उसके डग पग
    ले अपनें जीवन की भोर चली

    मधु "मुस्कान "

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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (03.10.2014) को "नवरात महिमा" (चर्चा अंक-1755)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।दुर्गापूजा की हार्दिक शुभकामनायें।

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  3. पवन जी की यह कविता बहुत ही सुन्दर है ।

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  4. Bharosa aaaj bhi hai ...aur aaj bhi hai yah tutane ke liye.... Bahut sunder rachna ..har pankti bharose ko vykt krti hai !!!

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