Sunday, October 13, 2013

अनकही ही रह गयी वोह बात..............फैज़ अहमद फैज़



हम कि ठहरे अजनबी इतनी मुलाकातों के बाद
फिर बनेंगे आशना* कितनी मुदारातों के बाद
[*acquainted, friendly]
कब नज़र में आएगी बे-दाग़ सब्ज़े की बहार
खून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद

थे बोहत बे-दर्द लम्हे ख़त्म-ए-दर्द-ए-इश्क के
थीं बोहत बे-मेहर सुबहें मेहरबां रातों के बाद

दिल तो चाहा पर शिकस्त-ए-दिल ने मोहलत ही न दी
कुछ गिले शिकवे भी कर लेते मुनाजातों के बाद

उनसे जो कहने गए थे फैज़ जान सदके किये
अनकही ही रह गयी वोह बात सब बातों के बाद

-फैज़ अहमद फैज़
सौजन्यः बेस्ट ग़ज़ल.नेट

5 comments:

  1. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति,विजयादशमी (दशहरा) की हार्दिक शुभकामनाएँ!

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  2. बहुत सुन्दर .
    नई पोस्ट : रावण जलता नहीं
    नई पोस्ट : प्रिय प्रवासी बिसरा गया
    विजयादशमी की शुभकामनाएँ .

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  3. सुन्दर प्रस्तुति,......विजयादशमी की शुभकामनाएँ

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति,......विजयादशमी की शुभकामनाएँ

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