Thursday, January 17, 2013

तेरे सामने नजर उठाऊँ कैसे............डॉ. अनिल चड्ढा


गहराई में समाऊं कैसे
तेरी याद से जुदा होऊँ कैसे
गुजरे लम्हें भुलाऊँ कैसे
दिल से उठते धुएं से रोकी साँसे,

दबी चिनगारी बुझाऊँ कैसे.
रोम रोम में बस चुकी दुलार तेरा,
दाग इसके कहो मिटाऊँ कैसे.
खुद की निगाहों में गुनाहगार हुआ,

तेरे सामने नजर उठाऊँ कैसे
जो आ सकूँ तो कैसे न आऊँ,
तुझे जानबूझ कर रुलाऊँ कैसे.
शमा ने चाहा कि परवाना जले,

मरने के डर से इसे बुझाऊँ कैसे.
शोख नजरों ने की गुस्ताखी,
इनकी गहराईयों मे जाऊँ कैसे.

--डॉ. अनिल चड्ढा

13 comments:

  1. दबी चिनगारी बुझाऊँ कैसे.
    रोम रोम में बस चुकी दुलार तेरा,
    दाग इसके कहो मिटाऊँ कैसे.
    खुद की निगाहों में गुनाहगार हुआ,
    ------------------------------

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    1. राहुल भाई धन्यवाद

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  2. बेहद खूबसूरत पंक्तियाँ सुन्दर रचना बधाई

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    1. शुक्रिया अरुण भाई

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  3. मरने के डर से इसे बुझाऊँ कैसे.
    शोख नजरों ने की गुस्ताखी,
    इनकी गहराईयों मे जाऊँ कैसे

    इसके आगे कुछ लिखूं कैसे ............

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  4. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।

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  5. खूबसूरत पंक्तियाँ सुन्दर रचना ***^^^***दबी चिनगारी बुझाऊँ कैसे.
    रोम रोम में बस चुकी दुलार तेरा,
    दाग इसके कहो मिटाऊँ कैसे.
    खुद की निगाहों में गुनाहगार हुआ,

    तेरे सामने नजर उठाऊँ कैसे
    जो आ सकूँ तो कैसे न आऊँ,
    तुझे जानबूझ कर रुलाऊँ कैसे.
    शमा ने चाहा कि परवाना जले,

    मरने के डर से इसे बुझाऊँ कैसे.
    शोख नजरों ने की गुस्ताखी,
    इनकी गहराईयों मे जाऊँ कैसे

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  6. गहराई में समाऊं कैसे
    तेरी याद से जुदा होऊँ कैसे
    गुजरे लम्हें भुलाऊँ कैसे
    दिल से उठते धुएं से रोकी साँसे,
    ............खूबसूरत पंक्तियाँ

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  7. दबी चिनगारी बुझाऊँ कैसे.
    रोम रोम में बस चुकी दुलार तेरा,
    दाग इसके कहो मिटाऊँ कैसे.
    खुद की निगाहों में गुनाहगार हुआ,
    बहुत खुबसूरत अभिव्यक्ति :
    New post कुछ पता नहीं !!! (द्वितीय भाग )
    New post: कुछ पता नहीं !!!

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  8. बहुत खूबसूरत रचना ! एक बहुत ही भावपूर्ण उत्कृष्ट अभिव्यक्ति !

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