Thursday, October 25, 2012

तुम्हारी यादों के ज़ख्म है..........सुरेश पसारी "अधीर"


होती ही जा रही है, मेरी हर राह मुश्किल,
हर क़दम मुझे अब , दुश्वार होने लगा है।

चैन बहुत मिलता है ,अब तड़पने मे मुझे,
दर्द-ए-दिल ही ,दिल की दवा होने लगा है।

होने लगा खुद का ,वजुद भी मुझसे ज़ुदा,
ज़िन्दगी जबसे, तेरा सामना होने लगा है,

दुश्मनो से भी की ,दोस्ती की बात मैने,
पर फ़ासला ,अपनो से भी बढने लगा है।

इक तस्वीर हो गया है, इंसान दीवार पर,
इंसान भी अब ,क्या से क्या होने लगा है।

कुछ और नही ,तुम्हारी यादों के ज़ख्म है,
दर्द अब तो "अधीर", ज्यादा होने लगा है।

-सुरेश पसारी "अधीर"

22 comments:

  1. इक तस्वीर हो गया है, इंसान दीवार पर,
    इंसान भी अब ,क्या से क्या होने लगा है।

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    1. शुक्रिया राहुल भाई

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  2. सुन्दर प्रस्तुति ||

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  3. वाह ... बहुत खूब।

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  4. अफसोस है कि दर्द भी अब छोड़ता है साथ
    यह भी आखिर वक्त कहीं है ,और कहीं नहीं |.....अनु

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  6. होने लगा खुद का ,वजुद भी मुझसे ज़ुदा,
    ज़िन्दगी जबसे, तेरा सामना होने लगा है,

    दुश्मनो से भी की ,दोस्ती की बात मैने,
    पर फ़ासला ,अपनो से भी बढने लगा है।
    sajjan jee

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  7. होने लगा खुद का ,वजुद भी मुझसे ज़ुदा,
    ज़िन्दगी जबसे, तेरा सामना होने लगा है,

    दुश्मनो से भी की ,दोस्ती की बात मैने,
    पर फ़ासला ,अपनो से भी बढने लगा है।
    sundar

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  8. दुश्मनो से भी की ,दोस्ती की बात मैने,
    पर फ़ासला ,अपनो से भी बढने लगा है।
    क्यूँ होता है ऐसा ,समझ में आने लगा है ?

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    1. दीदी शुभ संध्या

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  9. कुछ और नही ,तुम्हारी यादों के ज़ख्म है,
    दर्द अब तो "अधीर", ज्यादा होने लगा है।
    भावपूर्ण रचना..
    हृदयस्पर्शी...
    :-)

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  10. सुन्दर पंक्तियाँ

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  11. भावों का समुद्र उमड आया है इस कविता मे।

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  12. वाह वाह वाह बहुत खूब एक एक लफ्ज़ बोलता हुआ |

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