Monday, September 10, 2018

उठो द्रौपदी..........अटलबिहारी वाजपेयी

   

उठो द्रौपदी वस्त्र संम्भालो
अब गोविन्द न आयेंगे।

कब तक आस लगाओगी तुम
बिके.. हुए अखबारों से।

कैसी रक्षा मांग रही हो
दु:शासन.... दरबारों से।

स्वंय...जो लज्जाहीन पड़े हैं
वे क्या लाज बचायेंगे।

उठो द्रोपदी वस्त्र संम्भालो
अब गोबिन्द न आयेंगे। Il१॥

कल तक केवल अंधा राजा
अब गूंगा बहरा भी है।

होंठ सिल दिये हैं जनता के
कानों पर पहरा भी है।

तुम्ही कहो ये अश्रु तुम्हारे
किसको क्या समझायेंगे।

उठो द्रोपदी वस्त्र संम्भालो
अब गोबिन्द न आयेंगे। ll२॥

छोड़ो मेंहदी भुजा संम्भालो
खुद ही अपना चीर बचा लो।

द्यूत बिछाये बैठे शकुनि
मस्तक सब बिक जायेंगे।

उठो द्रोपदी वस्त्र संम्भालो
अब गोविद न आयेंगे। ॥३॥

- स्मृतिशेष आदरणीय अटबिहारी वाजपेयी

Sunday, September 9, 2018

क्षणिकाएँ........पुरूषोत्तम व्यास

१-बैठा रहता

बहती धारा...
जिसको कविता कहता
दूर न पास
अंदर न बाहर
अपने आप में पूर्ण..

चलना कितना
दूर उसको ले आता
दरवाज़े के उस पार
आसमान नीलम-सा
मौन..
कविता गाता...।


२-प्रेम-कहानी

पढ़ने में
मुझें डर लगता...

क्योंकि
चमकते हुये तारों
और-
टूट के गिरते तारों में
फरक समझता हूँ...।


३-प्रेम...

कहते है ...
हर एक को होता और..
वह उड़ता रहता उसी
डगर में..

एक झलक ..देख
खिल उठता ..
इंद्रधनुष!

-पुरूषोत्तम व्यास

Saturday, September 8, 2018

बीत गया सारा दिन ..सुरेन्द्र शेखावत


सूरज सवेरे से 
जैसे उगा ही नहीं 
बीत गया सारा दिन 
बैठे हुए यहीं कहीं 

टिपिर टिपिर टिप टिप 
आसमान चूता रहा
बादल सिसकते रहे 
जितना भी बूता रहा

सील रहे कमरे में 
भीगे हुए कपड़े 
चपके दीवारों पर 
झींगुर औ' चपड़े 

ये ही हैं साथी और 
ये ही सहभोक्ता 
मेरे हर चिन्तन के 
चिन्तित उपयोक्ता 

दोपहर जाने तक 
बादल सब छँट गये 
कहने को इतने थे 
कोने में अँट गये 

सूरज यों निकला ज्यों 
उतर आया ताक़ से 
धूप वह करारी, बोली 
खोपड़ी चटाक से 

ऐसी तच गयी जैसे 
बादल तो थे ही नहीं 
और अगर थे भी तो 
धूप को है शर्म कहीं?

भीगे या सीले हुए 
और लोग होते हैं 
सूरज की राशि वाले 
बादल को रोते हैं?

ओ मेरे निर्माता 
देते तुम मुझको भी 
हर उलझी गुत्थी का 
ऐसा ही समाधान 
या ऐसा दीदा ही
अपना सब किया कहा 
औरों पर थोपथाप
बन जाता दीप्तिवान ।
-सुरेन्द्र शेखावत

Friday, September 7, 2018

तुम बदल गए.......आरती चित्तौडा

तुम बदल गए।
थामकर हाथ तुम्हारा,
चल पड़ी थी सपनों में रंग भर के
उम्मीद के पंख लगाकर,
सखा भाव से...
तुम बदल गए।

नहीं बात करते मेरे सपनों की,
महत्वाकांक्षाओं की,
ना ही किताबों की..
अब बात होती है,
मात्र व्हाट्सएप के मैसेज,
और फेसबुक के वीडियो की..
तुम बदल गए।

चेहरा देखकर नहीं जान पाते हो,
मन की बात,
भूल से गए हो,
रूठने, मनाने की बात...
तुम बदल गए।
कुछ टूट रहा है,
बहुत कुछ छूट रहा है...
रिश्तों में अनकही सी दूरी है,
डोर संवादों की,
कहीं तो अधूरी है..
तुम बदल गए...
तुम बदल गए...।
-आरती चित्तौड़ा

Thursday, September 6, 2018

स्व के अर्थ......शिल्पा शर्मा


स्व के अर्थ

नितान्त अकेली हूं,
पर उदास नहीं
कामों की लंबी सूची को
तह कर के
डाल दिया है
अलमारी के
सबसे ऊपरी खाने में
और चुरा लिया है
कुछ घंटों का समय
केवल अपने लिए
बैठूंगी यूं ही
पैर पे पैर चढ़ाए
गर्म चाय का मग लिए
हाथों में
ताकूंगी यूं ही
खिड़की के बाहर
देखूंगी दोपहर के
बदलते रंग
जानती हूं
नियमों में चल रही दुनिया
तो रोकेगी मुझे
कहेगी स्वार्थी हूं मैं
पर दुनिया तो
हर बात का लेबल लिए
तैयार खड़ी रहती है
उसकी हर बात पे
कान नहीं देना मुझे
उंहू... आज तो बिल्कुल नहीं
क्योंकि कभी कभी
जीवन का थोड़ा सा हिस्सा
स्व के लिए जीना
भी तो नितान्त ज़रूरी है
ये स्वार्थ
हू ब हू
परिचित करा जाता है
मुझे अपने
स्व के अर्थों से
और...
फिर जाग उठती है
इच्छा ज़िन्दगी के साथ
क़दमताल करने की

- शिल्पा शर्मा
मूल रचना

Wednesday, September 5, 2018

गीतुल मितवा........प्रेम शर्मा

भीगा-भीगा
रोया-रोया,
गीतुल मितवा
खोया-खोया,
कवन गुहारू
केहू अकुवारूँ ,
कण्ठ हलाहल
ताल कहरवा ।
           
सुर सम्वाद
सधे ना साधे,
मुखड़े-बोल
अधूरे-आधे,
नाद अनन्ता
सबद रमन्ता
न कोउ कन्ता
नाहि नहरवा ।
      
ओहि रे बचुआ
मानुष अँकुवा,
तुहिन तो
हमि इन्द्रधनुषवा,
जीवन जोगे
मरन अजोगे,
नदी-नाँव
यात्रा संजोगे,
समय जुझारू
काल बुहारू ,
निधनं श्रेयः
खेत सुरगवा ।
- प्रेम शर्मा

Tuesday, September 4, 2018

हाइकु.......डॉ. सरस्वती माथुर


तारा टूटा तो
 आसमां से दूर हो
 अनाथ हुआ ।
-*-
 अँधेरी रात
 पीली चाँदनी बनी
 रोशनदान ।
-*-
 ऊँची पहाड़ी 
 बर्फ जड़ी -पिघली 
 नदिया बनी ।
-*-
 धरा महकी
 पुष्प अगरबत्ती
 जब जलाई ।
-*-
 छोड़ तरु को 
 पतझड़ी पात भी
 संत से लगे ।
- डॉ. सरस्वती माथुर
5 अगस्त को आपने अपना जन्म दिन मनाया
सबने बधाइयां प्रेषित की...क्या पता था कि 
ये उनका अंतिम जन्म दिन है
गत् शनिवार को वे देवलोक गमन कर गई
परमपिता से विनती है
उन्हें अपनी चरणों में स्थान दें
हम सभी की ओर से भाव-भीनी श्रद्धाञ्जली