Monday, September 17, 2018

मौसम बदलने लगा.....नीना पॉल

वफ़ाओं का मौसम बदलने लगा
मुक़द्दर भी अब हाथ मलने लगा

तेरी ख़्वाहिशें दिल में हसरत लिए
पलकों पे सावन मचलने लगा

मिले हादसे मुझको हर मोड़ पर
सम्भलने से पहले फिसलने लगा

तेरी याद में खो गया इस क़दर
उम्मीदों का इक दीप जलने लगा

मिलने से पहले जुदाइयों का ग़म
पल-पल दिलों में ही पलने लगा

तुझे ढूँढता हूँ मैं यूँ दर -ब- दर
पैरों का छाला भी जलने लगा

दीवाना समझ लोग यूँ डर गए
हाथों में पत्थर उछलने लगा
-नीना पॉल

Sunday, September 16, 2018

आँखों में मेरे एक सपना है .....योगेश राठौर

आँखों में मेरे एक सपना है,
दिल कहता है वो मेरा अपना है.

ख्वाब में जलता हूँ मैं जिसके लिए,
आज फिर उसे सरे राह तकना है.

रोज़ रोज़ की शरारतें खुद से ही,
अब खुद से ही बच निकलना है.

मैं डर जाता हूँ परछाई देखकर,
इस अंधेरे को भी मुझे छलना है

सारे आईने तोड़ दिए हैं मैंने,
क़दमों को फूँक फूँक के चलना है.

गुलाबों से ख़ुशबूँ आती नहीं है,
किताबों को भी अब संभलना है।

ज़िंदगी सूरज की मोहताज नहीं,
शाम से कहो मुझे अब ढलना है

-यश-


Saturday, September 15, 2018

नींद की बातें..... कंचनप्रिया

नींद तुम ये ख़ता नहीं करना
हमें उनसे जुदा नहीं करना
ख़्वाब में भी यक़ीनन वो आये
मिलकर उनसे ये गुफ्तगू करना

वास्ता देना मेरी चाहत का
मेरे खामोश दिल की धड़कन का
मेरे इन्तज़ार के हरेक पल का
हिसाब उनसे रूबरू करना

खामख्वाह बात ना बहुत बढ़ जाये
ख्वाब बदख्वाब में ना बदल जाये
ये गरज मेरी है उनकी नहीं
गोया इसका ख्याल भी करना

चंद अल्फाज मेरे जुस्तजू के 
जज्बेहालात मेरे आरजू के
उनसे एकपल जुदाई गवारा नहीं
जिक्रे ख़ास ये ज़रूर करना !!!
-कंचनप्रिया


Friday, September 14, 2018

तेरी दोस्ती......विनीता तिवारी


कुछ तो पाया है मिरे दिल ने तेरे जाने में।
रात भर रोए थे, कुछ मोतियों को पाने में।।

फिर न कहना कि मुझे दोस्तों का मोल नहीं,
उम्र  गुज़री  है,  तेरी  दोस्ती  भुलाने  में।।

तुमने पूछा ही नहीं मुझसे मेरा हाल-ए-जिगर,
मैं  बताने  तो गया था,  तिरे  बुलाने में।।

कैसे कह दूं कि तेरा साथ मुझको ख़ास नहीं, 
ख़ुद को भूले हुए  हैं हम,  क़रीब लाने में।।

झुकती उठती है नज़र इक नज़र चुराने को,
जा के आती है, हमें साँस फिर ज़माने में।।

झूठ सब बातें हुई, बेख़ौफ़, मगर चूँ न हुई,
कितना कोहराम मचा है, ये सच बताने में।।

-विनीता तिवारी

Thursday, September 13, 2018

क्षितिज....गोपाल कृष्ण शुक्ल

दूर, बहुत दूर पर कहीं
हमने अक्सर देखा।

अम्बर के
नीलाभ पटल पर
मटमैली धरती
अपना रंग घोलती।

ये दृष्य देख कर
मेरा मन हुलस उठा
मष्तिष्क में
प्रश्न कौंधा
कैसे पावन-बन्धन में
बाँध रही है
धरती और अम्बर को
यह क्षितिज रेखा।

दूर, बहुत दूर पर कहीं
हमने अक्सर देखा।।

-गोपाल कृष्ण शुक्ल


Wednesday, September 12, 2018

जाने के ख्वाहिश हैं.....एस. नेहा

क्षितिज के उस पार 
जहाँ  मेरी जाने के ख्वाहिश हैं

वहां न ख्वाहिशों की  बेड़ियाँ हैं 
और न ही रिश्तों का दोहरापन 
वहाँ न ही उम्मीदें हैं 
और न ही किसी प्रकार का सूनापन 

वहां बसता है गर कुछ तो 
बस शांति का एहसास ....
मेरे चेहरे पे अब थकान दिखने लगी हैं 
मेरे आवाज में बेबसी सजने लगी है 
की मुझे ये दुनिया पसंद नहीं 
की मै थक गई हूँ।

अब मुझे इस थकान  को मिटाना है 
आवाज से इस बेबसी को मिटाना है 
कि मैं  जिन बन्धनों में बंध  गई हूँ 
तोड़ देना है उन्हें 
कि मुझे अब चीखना है  जोरों से   
कि मेरा खुदा  सुन सके 

और मेरा मसीहा मुझसे  मिल सके 
की अब तो मुझे क्षितिज के पार ही जाना है 
-एस. नेहा
दस साल पुरानी रचना

Tuesday, September 11, 2018

कमरे में बन के नूर रहना..........सतलज राहत


तुम्हारे रास्तों से दूर रहना 
कहा तक ठीक है मजबूर रहना

सभी के बस की बात थोड़ी है 
नशे में इस कदर भी चूर रहना

ना जाने किस कदम में छोड़ेगी
हमारे साथ होके दूर रहना

तुम्हारी याद ही तो जानती है
मेरे कमरे में बन के नूर रहना

सच तो ये है मेरी तमन्ना थी
तुम्हारी मांग का सिंदूर रहना

जो मेरे पास आना चाहती है
वो ही कहती है मुझसे दूर रहना

तो क्या ये ठीक है मेरे दिल में
तुम्हारा बन के यूँ नासूर रहना

मुझसे पूछो इतने पत्थरों में
कितना मुश्किल है कोहिनूर रहना

उसकी आदत मै आ गया है अब
हमारे नाम से मशहूर रहना

मैंने तो सिर्फ इतना जाना है
बड़ा मुश्किल है तुझसे दूर रहना

कभी इस्सा कभी सुकरात बनना
कभी सरमद कभी मंसूर रहना

ये शायरी नहीं तज्जली है
ज़ेहन ऐसे ही कोहेतूर रहना

सतलज हम तुझे पहचानते है
तुझे हक है युँही मगरूर रहना 
- सतलज राहत