होती ही जा रही है, मेरी हर राह मुश्किल,
हर क़दम मुझे अब , दुश्वार होने लगा है।
चैन बहुत मिलता है ,अब तड़पने मे मुझे,
दर्द-ए-दिल ही ,दिल की दवा होने लगा है।
होने लगा खुद का ,वजुद भी मुझसे ज़ुदा,
ज़िन्दगी जबसे, तेरा सामना होने लगा है,
पर फ़ासला ,अपनो से भी बढने लगा है।
इक तस्वीर हो गया है, इंसान दीवार पर,
इंसान भी अब ,क्या से क्या होने लगा है।
कुछ और नही ,तुम्हारी यादों के ज़ख्म है,
दर्द अब तो "अधीर", ज्यादा होने लगा है।
-सुरेश पसारी "अधीर"








