Friday, February 21, 2020

कविता प्यासी रह गई.....संध्या आर्य

हम बादल थे 
बरस गये 
पर 
जमीन सूखी रह गई 

तेरे समान के तह में 
दुनिया जहान सब था 
शरीर कुछ भी ना था 
हमारे लिये 
इक रुह की प्यास में 
हम जुदा रह गये 

ओंस थे घास पर 
और नमी आंखों की 
शब्द शब्द पिघले 
पर 
पंक्तियों की कतार में 
कविता प्यासी रह गई !!


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