Saturday, May 6, 2017

यों ही काटते रहें.....रोहित कौशिक









आओ हम यों ही
मरते-कटते रहें
और फूलने दें संतों की तोंद
बढ़ने दे  चोटी और तिलक की लंबाई
फलने दें मौलवियों की दाढ़ी।
कि जब तक सम्पूर्ण मानवता का रक्त
संतों की तोंद में न समा जाए
और इस रक्त से पोषित संतों की चोटी
और मौलवियों की दाढ़ी ज़मीन को न छू जाए
आओ हम यों ही काटते रहें
एक-दूसरे का गला।

-रोहित कौशिक 
कविता संग्रह 
'इस खंडित समय में' 
से साभार

5 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (07-05-2017) को
    "आहत मन" (चर्चा अंक-2628)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  2. कतिपय आधुनिक संतों पर सटीक प्रहार

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