Thursday, May 18, 2017

जीने की एक वजह काफी है.....विभा परमार


तलाशने की
कोशिश करती हूँ
जीवन से बढ़ती

उदासीनता की वजहें
रोकना चाहती हूं
अपने भीतर पनप रही
आत्मघाती प्रवृत्ति को
पर नजर आते हैं
धूप-छांव से इतने रंज औ गम
रेत की आंधियों सी मिली चोटें
और सूख चुकी पत्तियों सी उम्मीदें
कि न जीने के कारण तलाशना छोड़,
एक बार फिर से बारिश में
बाहें फैलाए जी भर के भीगूं
-विभा परमार 

2 comments:

  1. बहुत सुन्दर सार्थक रचना.....

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