Wednesday, November 30, 2016

महक उठी थी केसर...............स्मृति आदित्य जोशी "फाल्गुनी"


खिले थे गुलाबी, नीले,
हरे और जामुनी फूल
हर उस जगह
जहाँ छुआ था तुमने मुझे,

महक उठी थी केसर
जहाँ चूमा था तुमने मुझे,
बही थी मेरे भीतर नशीली बयार
जब मुस्कुराए थे तुम,

और भीगी थी मेरे मन की तमन्ना
जब उठकर चल दिए थे तुम,
मैं यादों के भँवर में उड़ रही हूँ
अकेली, किसी पीपल पत्ते की तरह,

तुम आ रहे हो ना
थामने आज ख्वाबों में,
मेरे दिल का उदास कोना
सोना चाहता है, और
मन कहीं खोना चाहता है
तुम्हारे लिए, तुम्हारे बिना।

स्मृति आदित्य जोशी "फाल्गुनी"

6 comments:

  1. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ।

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  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक चर्चा मंच पर 1-12-2016 को चर्चा - 2543 में दिया जाएगा ।
    धन्यवाद

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  3. सुन्दर शब्द रचना

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  4. सरलतम शब्दों में भावों की हृदयस्पर्शी व्यंजना कल्पना लोक की यात्रा पर ले जाती हैं. बधाई!

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