Sunday, April 20, 2014

ये दुनिया है दिल नही चेहरे देखती है...............प्रकाश सिंह बघेल ''बाबा''



वो तो अब महल नही पहरे देखती है ,
ये दुनिया है दिल नही चेहरे देखती है ,

भले ही फुटपाथ पर सोती है वो आँख ,
लेकिन ख्वाब वो भी सुनहरे देखती है,

वो तो अब महल नही पहरे देखती है ,
ये दुनिया है दिल नही चेहरे देखती है ,

भले ही फुटपाथ पर सोती है वो आँख ,
लेकिन ख्वाब वो भी सुनहरे देखती है,

पता है वक़्त उनके घर से निकलने का,
सारी दुनिया नाज़नीन के नखरे देखती है ,

वो भी इश्क करती है पर डरती है बहुत ,
पगली है वो मंजिल नही खतरे देखती है ,

पढ़ लेती मेरी आँखों कि मायूसी को भी ,
वो मेरी माँ है जो इतने गहरे देखती है ,

गंदी बस्तियों में भी कुछ सितारे रहते है ,
तेरी अमीरी है जो इनमे कचरे देखती है ,

-प्रकाश सिंह बघेल ''बाबा''

7 comments:

  1. -सुंदर रचना...
    आपने लिखा....
    मैंने भी पढ़ा...
    हमारा प्रयास हैं कि इसे सभी पढ़ें...
    इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना...
    दिनांक 21/04/ 2014 की
    नयी पुरानी हलचल [हिंदी ब्लौग का एकमंच] पर कुछ पंखतियों के साथ लिंक की जा रही है...
    आप भी आना...औरों को बतलाना...हलचल में और भी बहुत कुछ है...
    हलचल में सभी का स्वागत है...

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  2. बहुत सुन्दर रचना..

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  3. बहुत सुन्दर !

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  4. Baghela jee bahut sunder rachana

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  5. गंदी बस्तियों में भी कुछ सितारे रहते है ,
    तेरी अमीरी है जो इनमे कचरे देखती है
    सुन्दर प्रस्तुति

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