Thursday, April 17, 2014

प्रवासी कविता : बसंत-गीत.......शकुन्तला बहादुर


सखि बसंत आ गया
सबके मन भा गया
धरती पर छा गया
सुषमा बिखरा गया

आमों में बौर लदे
कुहू-कुहू भली लगे
बागों में फूल खिले
भौंरे हैं झूम चले

मंद-मंद पवन चली
मन की है कली खिली
शिशिर शीत भाग गया
सुखद बसंत आ गया

खुशियां बरसा गया
सखि बसंत आ गया।

- शकुन्तला बहादुर
लेखिका एन. आर. आई. हैं

7 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (18.04.2014) को "क्या पता था अदब को ही खाओगे" (चर्चा अंक-1586)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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  2. सुन्दर गीत मंज़री

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  3. सुन्दर, सम्यक, सहज, सरल अभिव्यक्ति. बधाई.

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