Thursday, March 6, 2014

कहीं किसी ख़याल का निशान भी नहीं बचा..........सौरभ शेखर


यक़ीन मर गया मिरा, गुमान भी नहीं बचा
कहीं किसी ख़याल का निशान भी नहीं बचा

ख़मोशियाँ तमाम ग़र्क़ हो गयीं ख़लाओं में
वो ज़लज़ला था साहिबो बयान भी नहीं बचा.

नदी के सर पे जैसे इंतक़ाम सा सवार था
कि बाँध, फस्ल, पुल बहे, मकान भी नहीं बचा

हुजूम से निकल के बच गया उधर वो आदमी
इधर हुजूम के मैं दरमियान भी नहीं बचा

ज़मीं दरक गयी सुलगती बस्तियों की आग से
ग़ुबार वो उठा कि आसमान भी नहीं बचा

बिखरती-टूटती फ़सील नींव को हिला गयी
कि दाग़ ज़ात पर था, ख़ानदान भी नहीं बचा

तमाम मुश्किलों को हमने नींद में दबा दिया
खुला ये फिर कोई इम्तिहान भी नहीं बचा

सौरभ शेखर 09873866653
http://wp.me/p2hxFs-1GA

9 comments:

  1. तमाम मुश्किलों को हमने नींद में दबा दिया
    खुला ये फिर कोई इम्तिहान भी नहीं बचा। मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा।

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  2. तमाम मुश्किलों को हमने नींद में दबा दिया
    खुला ये फिर कोई इम्तिहान भी नहीं बचा..................सुंदर चित्रण

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  3. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (07.03.2014) को "साधना का उत्तंग शिखर (चर्चा अंक-१५४४)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें, वहाँ आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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  4. आपकी यह पोस्ट आज के (०६ मार्च, २०१४) ब्लॉग बुलेटिन -ईश्वरीय ध्यान और मानव पर प्रस्तुत की जा रही है | बधाई

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  5. बहुत बढ़िया अभिव्यक्ति ......

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  6. अपनी शर्म में सार हो मर गया वो शहरयार..,
    उसकी ज़ेरे-ख़ाक को श्मसान भी नहीं बचा.....

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  7. सुंदर रचना...

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