Tuesday, March 6, 2018

परिक्रमा....डॉ. भावना कुँअर


परिक्रमा!
तुम यहाँ
तुम यहाँ क्यों खड़ी हो
अभी तो तुम वहाँ थी
ये कैसे सम्भव है
कि तुम दोनों जगह मौजूद हो
क्योंकि तुम तो एक हो
अभी तो सुख से विलीन थी
अब यहाँ दु:ख से आसक्त हो
असम्भव है ये
तुम्हारा दोनों जगह होना
क्या?
सुख दु:ख का
पाठ पढ़ा रही हो!
या व्यर्थ ही
चक्कर लगा रही हो!
कभी तो तुम
दो दिलों को
एक करने के लिये
अग्नि के फेरे लगा रही हो
कभी विरह व्यथा में जलते हुए
पिता का पुत्र से वियोग दिला रही हो

-डॉ. भावना कुँअर

Monday, March 5, 2018

कैसा ढाया क़हर है.....आशुतोष शर्मा

अपनों ने कैसा ढाया क़हर है
रिश्तों में घोल डाला ज़हर है।

बन गए मज़हब के हाकिम सभी
जाने कैसी चल पड़ी लहर है।

झूठ का है दौर खुल कर बोलिए
सच्चाई कि अब नहीं ख़ैर है।

कहाँ तक चलोगे लेके उसूलों को
देखिए तो हर तरफ़ अँधेर है।

ख़ूब करो लूट, क़त्ल और ग़ारत
काफ़ी बड़ा अपना भी शहर है।

चीखें पुकारें बेबसी की गूँज रही
नए वक़्त की यह नई बहर है।
-आशुतोष शर्मा

Sunday, March 4, 2018

मुखर मेल......अलका गुप्ता

नाट्यकार सा !
जीवन रंग मंच !
शाज मुखौटा !
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मुखर मेल !
सुख-दुखिया खेल !
नकाब पोशी !
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धुनी रमाए !
साधु भए सियार !
छले मुखौटा !
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मांजे चेहरे !
पहन शराफ़त !
डाले ये डाँके !
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साजें तन क्या !
माटी घट ये चोला !
रूह..बुहारें !
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लेने दो साँस !
आत्मा को संस्कार की !
नश्वर तन !
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श्वास ले आत्मा !
अक्षय..अमर वो !
तन ये चोला !

टिप्पणी में एक ताँका__

रंग रंग के !
रूप-कुरूप मास्क !
शुभ-अशुभ !
घाव..घने..या हास !!

जीवंत जिएं विलास !!
-अलका गुप्ता

प्राप्ति स्त्रोत्रः
तस्वीर क्या बोले


Saturday, March 3, 2018

थोड़ी नमी तो लाज़मी है.....मनी यादव

वो गया  है  बेदिली  तो लाज़मी  है
आँसुओं से दोस्ती तो लाज़मी है

धूप सूरज से बग़ावत कर रही है
इश्क़ में आवारगी तो लाज़मी है

उस नज़र में देखा ख़ुद को मुद्दतों बाद
आँख में थोड़ी नमी तो लाज़मी है

याँ अदब की सब चितायें जल चुकी हैं
सल्तनत में तीरगी तो लाज़मी है
-मनी यादव

Friday, March 2, 2018

होली..........प्रेम लता पांडे


ये मौसम सुहाना
होली का बहाना
हमें प्यार है उड़ाना
पहल कर दिखाना। 

ये रंगी हवाएँ
फूलों को झुलाएँ
हमें पास बुलाएँ
लेतीं हमारी बलाएँ

ये मस्ती का भाव
सबको खेलने का चाव
ना ओ किसी को ताव 
रहे सबका यही ख्वाब। 

ना हो कोई उदास
जीवन में निराश
मिलन की हो आस
सब आएँ पास-पास। 

रंग चढ़े मनपर
ना हो कभी कमतर
चाहे ना चढ़े तनपर
पर हो फुहार सब पर। 

कोई घर ना बचे
कोई शहर ना रहे
कोई भी ना छूटे
कोई दिल ना टूटे 

दिल दिल से मिलें 
वैर के पते झड़ें
देवस्थ दूर हम करें
रंग राग के भरें। 

रंग ऐसा लगे 
कि सब रंगमय लगे
कुछ ना अलग दिखे
सब पहचान ही मिटे। 

सब जाति के रंग
सब धर्मों के रंग
घोलकर प्यार के रंग में
मल दो हरेक के मन में

ना रहे कोई भी अलग ढंग में।
रहे मस्त होली के हुड़दंग में
रंग जाएँ मानवता के रंग में।
-प्रेम लता पांडे

Thursday, March 1, 2018

गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले....फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले

क़फ़स उदास है यारो सबा से कुछ तो कहो
कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले

कभी तो सुब्ह तिरे कुंज-ए-लब से हो आग़ाज़
कभी तो शब सर-ए-काकुल से मुश्क-बार चले

बड़ा है दर्द का रिश्ता ये दिल ग़रीब सही
तुम्हारे नाम पे आएँगे ग़म-गुसार चले

जो हम पे गुज़री सो गुज़री मगर शब-ए-हिज्राँ
हमारे अश्क तिरी आक़िबत सँवार चले

हुज़ूर-ए-यार हुई दफ़्तर-ए-जुनूँ की तलब
गिरह में ले के गरेबाँ का तार तार चले

मक़ाम 'फ़ैज़' कोई राह में जचा ही नहीं
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले
-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

Wednesday, February 28, 2018

आयत और श्लोक.............. रचना सिंह

"आयतें" आती थीं
होली दिवाली "श्लोकों" के घर 
पर धमाके नहीं होते थे

"श्लोक" आते थे
ईद बकरीद "आयतों" के घर 
पर खून खराबे नहीं होते थे

फिर अब क्यों ये हो रहा है 
क्यों धमाके और ख़ून खराबे से 
होली दिवाली ईद बकरीद 
पर जशन नहीं मातम होते हैं
-रचना सिंह