Monday, September 8, 2014

हिलती हैं दीवारें...............डॉ. दीनदयाल दिल्लीवार
















रोज,
हर रोज ही
हिलती हैं
दीवारें
मेरे घर की
मारा जाता है
अनजानें ही
जब कोई-
आदमी
तो कांपता है
नक्शा
हिन्दुस्तान का

डॉ. दीनदयाल दिल्लीवार,
बालोद, जिला दुर्ग, छत्तीसगढ़
.........अवकाश, नवभारत

Sunday, September 7, 2014

क्यों हो गई पायल छोटी..............कविता वाचक्नवी

    



चलना सीखते ही
पहना जाती है, नानी
घुंघरुओं की पायल
रुनुन..झुनुन.....टुनुन...नुनुन
गूंजता है... दिन भर...
घर के भीतर,ठण्डे सलेटी फर्श पर
शीघ्रता से....
और शीघ्रता से

बढ़ने लगी-पायल बंधी गोलाइयां
छोटी हो गई-पायलें
और कसने लगी,
उतार
खूब दौड़ लगाई
पत्थर बिछी गली की
तितलियों के पर पकड़ने
बादलों के श्वेत पद छूने
टिमटिमाते तारे
झोली में बटोर लेने को.

इस दौड़ में छूट गई
पत्थर वाली गली
काली सड़कों तक आते-आते
न रंगीली तितलियां थी
न बादलों का श्वेत पग,
सब ओर एक-सी
काली कोलतारी सड़कें
एक-सी बस्तियां
एक-से लोग

भूल जाती है रास्ता...।

पूछती है भीड़, घर का पता
पर..
सलेटी फर्श
पत्थर की गली
चौबारे का कमरा
याद है इतना भर उसे,
नाम- ठिकाना
कभी न जाना
और भीड़ में
हिचकियां लेकर
लगती है रोने.....।

क्यों हो गई पायल छोटी
क्यों पुरतीं नहीं
टखनें की गोलाइयां अब
क्यों सारी सड़कें/बस्तियां/मकान
हैं एक-से
और क्यों नहीं
किसी तरह
लौट सकती
मैं ?

ना......नी... !!


-कविता वाचक्नवी


अमृतसर में जन्म
साहित्य और भाषा की अध्येता
ब्रिटेन में रहते हुए
लेखन व अध्ययन से जुड़ाव

Saturday, September 6, 2014

चाहत के हक़दार नहीं थे......................अमर मलंग





चाहत के हक़दार नहीं थे

उल्फ़त के बाज़ार नहीं थे


कैसे होती ये ग़ज़ल मुकम्मल,

शेर भी कुछ दमदार नहीं थे


बहुत तलाशा मिली न मंज़िल,

रास्ते भी हमवार नहीं थे


चमन की लूटी जिसने ख़ुशबू,

फूल ही है, वो ख़ार नहीं थे


गीत ख़शी के क्या गाते हम,

साथ हमारे वो यार नहीं थे


महफ़िल में जो घाव मिले हैं,

दुश्मन के वो वार नहीं थे


क्या हुआ जो पाई ठोकर.

अच्छे के तो आसार नहीं थे

-अमर मलंग

........... मधुरिमा से

Friday, September 5, 2014

कई ज़माने देखे..................-गोविन्द भारद्वाज






हमने कई ज़माने देखे,
दोस्त नये-पुराने देखे.

नशे मुक्त शहरों में हमने,
गली-गली मयखाने देखे

प्रेम नगर की इस बस्ती में
राह खड़े दीवाने देखे.

रपट कहां कोई लिखवाए
गुण्डो के घर थाने देखे

इन वीरानी-सी आँखों में
ख्वाब कई सुहाने देखे

बेच ज़ायदाद ब़ुज़ुर्गों की
दौलतमंद सयाने देखे

-गोविन्द भारद्वाज
 
........... मधुरिमा से

Wednesday, September 3, 2014

इनायत मत समझ लेना............हबीब कैफी



किसी से हंस के मिलने को मोहब्बत मत समझ लेना
कोई खामोश रहे तो अदावत मत समझ लेना

ये आती है तजुर्बों से, बुजुर्गों से ये मिलती है
किताबों के हवालों को ज़हानत मत समझ लेना

बुलाने से नहीं आते, ख़ुदा भिजवाता है इनको
जो आए घर कोई मेहमां, मुसीबत मत समझ लेना

शिकारी प्यार से दाना दिया करता है पंछी को
शिकारी की मोहब्बत को इनायत मत समझ लेना

जो लटकाता है फ़ांसी पर वो पहले पैर छूता है
किसी के झुक के मिलने को शराफत मत समझ लेना

-हबीब कैफी


प्राप्ति स्रोतः हेल्थ, पत्रिका

Tuesday, September 2, 2014

प्रार्थना का वक्त.............विपिन चौधरी

प्रार्थना का वक्त
यह प्रार्थना का वक्त है
एक सात्विक अहसास के साथ
हाथ जोड़कर खड़े हो जाओ
एक कतार में।

सभ्यताएं अपने तयशुदा हिस्सों को
एक-एक कर छोड़ती जा रही
बरसों पुरानी स्थापित इमारतें
दरक रही है अपनी नींव से
धीरे-धीरे।

पिछले हफ्ते के
सबसे अमीर आदमी को पछाड़कर
पहली संख्या पर जा विराजा है कोई
अभी-अभी।

नंगे पांवो को कहीं जगह नहीं है
और कीमती जूते सारी जगह को
घेरते चले जा रहे हैं।

अंधेरे को परे धकेल कर
रोशनी आई है सज संवरकर
आज सुबह ही उससे दोस्ती करने को
लालायित हैं कई दोस्त अपने भी

वाकई यही प्रार्थना का
सही वक्त है


-विपिन चौधरी
vipin.choudhary7@gmail.com



विपिन चौधरीः
२ अप्रैल १९७६, भिवानी (हरियाणा),खरकड़ी- माखवान गाँव
बी. एससी., एम. ए.(लोक प्रकाशन)
हरियाणा के भिवानी जिले के एक गाँव
जन्मी विपिन जी की कविताएं सहजता के साथ खुलती है

रचना प्राप्तः तरंग, नई दुनियां

 





Monday, September 1, 2014

एक खत.............अमृता प्रीतम


चांद सूरज दो दवातें, कलम ने बोसा लिया
लिखितम तमाम धरती, पढ़तम तमाम लोग
 
साईंसदान दोस्तों !
गोलियां, बंदूकें और एटम बनाने से पहले
इस ख़त को पढ़ लेना

हुक्मरान दोस्तों !
सितारों की हरफ़ और किरणों की बोली
अगर पढ़नी नहीं आती
किसी अदीब से से पढ़वा लेना
अपने किसी महबूब से पढ़वा लेना
और हर एक मां की यह मातृ-बोली है
तुम बैठ जाना किसी ठाँव
और ख़त पढ़वा लेना अपनी मां से
फिर आना और मिलना
कि मुल्क की हद है जहां है
एक हद मुल्क का
और नाप कर देखो
एक हद इल्म का
एक हद इश्क की
और फि बताना कि किसकी हद कहां है

चांद सूरज दो दवातें
हाथ में कलम लो
इस ख़त का जवाब दो
-तुम्हारी-अपनी-धरती

तुम्हारे ख़त की राह देखते बहुत फिकर कर रही

-अमृता प्रीतम
जन्मः 31 अगस्त , 1919
गुजरावाला , पंजाब
निधनः 31 अक्टूबर 2005, दिल्ली


स्रोतः रसरंग