Tuesday, September 3, 2013

चलाए तीर जितने सब हुए अब बेअसर उनके..........डॉ. लोक सेतिया 'तन्हा'


उड़ाने ख्वाब में भरते, कटे जब से हैं पर उनके
अभी तक हौसला बाकी, नहीं झुकते हैं सर उनके।

यही बस गुफ्तगू करनी, अमीरों से गरीबों ने
उन्हें भी रौशनी मिलती, अंधेरों में घर उनके।

उन्हें सूली पे चढ़ने का तो कोई गम नहीं था पर
यही अफसोस था दिल में, अभी बाकी समर उनके।

कहां पूछा किसी ने आज तक साकी से पीने को
रहे सबको पिलाते पर, रहे सूखे अधर उनके।

हुई जब शाम रुक जाते, सुबह होते ही चल देते,
जरा कुछ देर बस ठहरे, नहीं रुकते सफर उनके।

दिए कुछ आंकड़े सरकार ने क्या-क्या किया हमने
बढ़ी गिनती गरीबों की, मिटा डाले सिफर उनके।

हमारे जख्म सारे वक्त ने ऐसे भरे 'तन्हा'
चलाए तीर जितने सब हुए अब बेअसर उनके।

-डॉ. लोक सेतिया 'तन्हा'

जम कर रह गये हैं जो बादल!!.................दफैरून


जम कर रह गये हैं बादल
बरस नहीं रहे अभी
शायद, न भी बरसें


फिर भी अपने लत्तर-पत्तर उठा कर
भीतर तो रख ही लो


अपनी मीनारों पर लगे
तड़ित चालकों को जाँच-परख लो


जमकर रह गये हैं जो बादल
शायद, बरस भी सकते हैं


समुद्र का समुद्र भरा है इनमें
हजारों बोल्ट की भरी है बिजली।


--दफैरून

दफैरुन को छोटी छोटी चीजों का कवि कहा जा सकता है। 
अंकिचन में कितना कुछ छिपा है यह दफैरून की कविताओं में आकार लेता है। दफैरुन जितना सहज लिखते हैं , उतना सहज जीते हैं यही कारण है कि आपकी कविताओं में अजीब सी आत्मीयता दिखती है 
जो आज कस्बों तक में लुप्त होती जा रही है। 
संपर्कः 48 , मोहन गिरि, विदिशा, मध्य प्रदेश -464001

Monday, September 2, 2013

आस्था.....................धर्मवीर भारती

रात
पर मैं जी रहा हूं निडर
जैसे कमल
जैसे पंथ
जैसे सूर्य
क्योंकि
कल भी हम मिलेंगे
हम चलेंगे
हम उगेंगे
और
वे सब साथ होंगे
आज जिनको रात ने भटका दिया है!
-धर्मवीर भारती

हमारा संयुक्त सफर....विपिन चौधरी

इस बार वह अपनी आँखो में
शहद भर कर लौटा
मैंनें मान लिया
अब मेरे दिन
मधुमक्खियों के सहारे ही कटेंगे...



जब वह अपने
बगल में आकाश को दबा कर
घर आता है
तो मेरी आँखों में काले बादल घुमड़ आते हैं

इस सच पर अपनी अंगुली रख ही दूँ कि
अब हम दोनों के बीच
मूक समझौते
इसी तरह बिना किसी करतल ध्वनि के
पारित होते आए हैं

-विपिन चौधरी

Sunday, September 1, 2013

धरती पर पहले पहल....विपिन चौधरी

एक तरफ की रोटी को
थोड़ा कच्चा रख
दूसरी तरफ को
थोड़ा ज्यादा पकाकर फूली हुई
रोटी को बना कर एक स्त्री
अनजानें में ही संसार की
पहली गृहस्थन बन गई होगी


जिस प्राणी की आँखों में पहले-पहल नग्न शिला देख
गुलाबी डोरों नें जन्म लिया होगा
उसे पुरुष का नाम दे दिया होगा

जो अपने मन - भीतर उठती सीली भाप
में यदा-कदा सुलग उठा हो
उसने ही आगे चल कर
प्रेम की राह पकड़ ली होगी

धरती ने
मनुष्यो की इन कोमल गतिविधियों पर खुश होते हुए
अपने सभी बन्द किनारे खोल दिये होंगें

फिर एक दिन जब पुरुष,
स्त्री को चारदिवारी भीतर रहने को कह
अपने लिये यायावरी निश्चित कर
बाहर खुले आसमान में निकल आया होगा
तब धरती चाह कर भी अपने खुले हुए
किनारों को समेट ना पाई होगी....

--विपिन चौधरी

हालात से दो-दो हाथ............श्रीराम मीणा


देखिये उन बस्तियों को, फिर जलाता कौन है।
देखिये उन कश्तियों को, फिर डुबाता कौन है॥

गश्त, एवं कर्फ्यू का नाम आजादी नहीं-।
देखिये उन गश्तियों को, फिर लगाता कौन हैं॥

हम सभी भूखों मरें, वे राज हम पर कर रहे-।
देखिये उन हस्तियों को, फिर बनाता कौन हैं॥

हमने अपने खून से, हर शब्द लिक्खा है जहां।
देखिये उन नश्तियों को, फिर जलाता कौन हैं॥

चलाते चमड़े के सिक्के, एक दिन के बादशाह।
देखिये उन भिश्तियों को, फिर बनाता कौन हैं॥

-श्रीराम मीणा

वक्त का तूफाँ आँसू पोंछ डालेगा.......सुशील सरित


कश्तियां खेते रहो साहिल पुकारेगा
वक्त का तूफाँ आँसू पोंछ डालेगा
आज यदि मंझधार में हो कल यही दरिया
खुद-ब-खुद उठकर किनारे पर उछालेगा

ठोकरों ने कर दिया है पांव घायल
किन्तु रुकने के समझ लो हम नहीं कायल
लड़खड़ाते ही सही चलना ज़रूरी है,
रास्ता कदमों को खुद सम्हालेगा

सफ़र है लम्बाअंधेरा भी घना गहरा
भय भटकने का यहां हर मोड़ पर पहरा
किन्तु यह तय है उसी की बस विजय होगी
अन्त तक जो दौड़ में हिम्मत न हारेगा

-सुशील सरित

सौजन्यःदेशबन्धु, रायपुर