Saturday, February 10, 2018

वो उग आये................ शंकर सिंह परगाई


उग आते हैं 
तुम्हारे मन–मस्तिष्क के 
उन गीले 
कोनों पर 
जहाँ भी 
हल्की-सी सीलन है। 

वहाँ पनप जाते है वो  
तुम्हारे भीतर 
तब तुम्हें 
उनकी ही तरह 
सही लगता है 
किसी एक रंग को ही 
सारे रंगो से फीका कहना। 

गुमान लगता है तुम्हें 
भूखे पेट भी 
मंदिर मस्जिद का
नारा लगाना।

नही चुभते है तब तुम्हारे  
कोमल हृदय में 
कैक्टस के सख़्त काँटे भी 
आख़िर जगह दी थी 
तुमने ही..।

वो उग आये  
मन–मस्तिष्क के 
गीले कोनों पर 
जहाँ हल्की-सी भी 
सीलन रहती रही। 

- शंकर सिंह परगाई

4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (11-02-2018) को 'रेप प्रूफ पैंटी' (चर्चा अंक-2876) (चर्चा अंक-2875) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. वाह
    बहुत सुंदर
    सादर

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